फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 245, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें२४४ फलदीपिका शाप के कारण ऐसा है । यदि शुक्र और चन्द्रमा दोनों मान्दि के साथ हों तो यह समझना चाहिये कि इस व्यक्ति ने किसी गाय या युवती स्त्री की पूर्वजन्म में हत्या की है । किन्तु यदि केतु या बृहस्पति, मान्दि के साथ पंचम में हों तो समझिये कि इसने पूर्व जन्म में किसी ब्राह्मण की हत्या की है ॥२०, २१, २२॥ एवं हि जन्मसमये बहुपूर्वजन्म- कर्मार्जितं दुरितमस्य वदन्ति तज्ज्ञाः । तत्तद्ग्रहोक्तजपदानशुभक्रिया- भिस्तद्दोषशान्तिमिह शंसतु पुत्रसिद्ध्यै ॥२३॥ ' इस प्रकार जन्म-कुण्डली के ग्रहों से यह पता चलता है कि पिछले अनेक जन्मों में इसने क्या-क्या पाप किये जिसके कारण सन्तान हीनता है। पुत्रोत्पत्ति के लिये यह आवश्यक है कि जो-जो ग्रह बाधाकारक हो उस-उस ग्रह के लिए जो-जो जप, दान और शुभ-क्रिया बतायी है वह-वह करे । दोष शान्ति होने से पुत्रोत्पत्ति हो सकती है ॥२३॥ सेतुस्नानं कीर्तनं सत्कथायाः पूजां शंभोः श्रीपतेः सद्व्रतानि । दानं श्राद्धं कर्जनागप्रतिष्ठां कुर्यादेतैः प्राप्नुयात्सन्ततिं सः ॥२४॥ ऊपर के श्लोक में उल्लेख आया है कि विविध शुभ क्रिया करे । इस श्लोक में यह बताते हैं कि कौन-कौन सी शुभ-क्रिया करने से सन्तान प्रतिबन्धक दोष की शान्ति होकर पुत्र प्राप्ति हो सकती है :