भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 684 में से

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पृष्ठ 236

बारहवाँ अध्याय : पुत्रभाव फल २३५ नीचे दो योग दिये जाते हैं। यदि इन दोनों में से कोई योग हो तो जातक के पुत्र न हो या पुत्र के कारण क्लेश हो। (i) पाप-ग्रह लग्न में हो, लग्नेश पंचम में हो, पंचमेश तीसरे घर में हो और चन्द्रमा चौथे घर में। इस योग से पुत्र नहीं होता। (ii) चन्द्रमा ओज राशि और ओज अंश में स्थित होकर पांचवे घर में हो और सूर्य से देखा जाता हो। यह योग होने से या तो पुत्र न हो या पुत्र के कारण क्लेश हो।¹ ॥७॥ मान्दं सुतर्क्षं यदि वाऽथबौधं मान्द्यर्कपुत्रान्वितवीक्षितं चेत् । दत्तात्मजः स्यादुदयास्तनाथ- संबन्धहीनो विबलः सुतेशः ॥८॥ नीचे दो योग दिये जाते हैं। इन दोनों योगों में से यदि कोई योग हो तो जातक के औरस पुत्र नहीं होते किन्तु वह लड़का गोद लेता है। अपने शरीर से, अपनी भार्या में जो पुत्र होता है वह औरस कहलाता है। (i) यदि पंचम भाव पर मिथुन, कन्या, मकर या कुम्भराशि हो और मान्दि² या शनि वहां बैठे हों या पंचम को देखते हों। (ii) यदि पंचमेश निर्बल हो और लग्नेश तथा सप्तमेश से कोई सम्बन्ध न करे ॥८॥ नीचारिमूढोपगते सुतेशे रिःफारिरन्ध्राधिपसंयुते वा ।

१. मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ ओज राशि कहलाती हैं। २. मान्दि को गुलिक भी कहते हैं।

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