भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 248

बारहवां अध्याय : पुत्रभाव फल २४७ उपर्युक्त में जो बलवान् हो उसकी दशा-अन्तर्दशा में पुत्रोत्पत्ति होती है ।॥२८॥ जीवे तु जीवात्मजनाथभांशक- त्रिकोणगे पुत्रजनिर्भवेन्नृणाम् । अथान्यशास्त्रेण च जन्मकालतो निरूपयेत्सन्ततिलक्षणं बुधः ॥२९॥ पुत्रोत्पत्ति का समय जानने के लिये एक दूसरा प्रकार निम्नलिखित है । यह देखिये कि बृहस्पति से पंचम कौन सा स्थान है । बृहस्पति से पंचम जो राशि हो उसका स्वामी किस राशि और नवांश में है ? उस राशि या नवांश से जब त्रिकोण में गोचरवश बृहस्पति आवे तब पुत्र होगा। यह गोचरवश विचार है। कुछ अन्य शास्त्रों का कथन है कि जन्म कालीन ग्रहों से सन्तान लक्षण बताना चाहिये ।॥२९॥ जन्मनक्षत्रनाथस्य प्रत्ययर्क्षाधिपस्य च । स्फुटयोगं गते जीवे त्रिकोणे वा सुतोद्भवः ॥३०॥ यह देखिये कि चन्द्रमा किस नक्षत्र में है । इस नक्षत्र का स्वामी और इस नक्षत्र से पाँचवें नक्षत्र का स्वामी जो ग्रह हो उनकी राशि अंश, कला, विकला जोड़ लीजिये । जो योग आवे उस राशि, अंश, कला, विकला पर या उससे नवम, पंचम गोचरवश बृहस्पति आवे तब पुत्रोत्पत्ति होगी ।॥३०॥ निषेकलग्नाद्दिनपस्तृतीये राशौ यदा चारवशादुपैति ।