भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

तेरहवां अध्याय : आयुर्भाव २५९ अल्पायु। यदि आठवें घर का स्वामी और सब क्रूर-ग्रह (१) केन्द्र में हो तो अल्पायु (२) पणफर में हो तो मध्यायु और (३) आपोक्लिम में हों तो दीर्घायु होता है । यह देखिये कि निम्नलिखित परस्पर मित्र हैं या सम या शत्रु ; (क) चन्द्र जिस राशि में है उसका स्वामी और चन्द्रमा जिस राशि में है उससे अष्टम का स्वामी आपस में । (ख) लग्नेश और अष्टमेश आपस में । (ग) लग्नेश और सूर्य आपस में । यदि ये परस्पर मित्र हों तो दीर्घायु; सम हों तो मध्यायु; शत्रु हों तो अल्पायु ॥ १५ ॥ लग्नाधिपो लग्ननवांशनायको जन्मेश्वरो जन्मनवांशनायकः । स्वस्वाष्टमेशाद्यदि चेद्बलान्विता दीर्घायुषः स्युर्विपरीतमन्यथा ॥१६॥ यदि लग्न का स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो, यदि लग्न नवांश का स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो, यदि जन्म राशि का स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो और चन्द्रमा जिस नवांश में है उसका स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो तो दीर्घायु होती है किन्तु यदि लग्नेश आदि अपने अपने अष्टमेश की अपेक्षा दुर्बल हों तो अल्पायु होती है । ऊपर जो विचार दिया गया है उसमें लग्न कुण्डली के साथ साथ नवांश कुण्डली की भी आवश्यकता पड़ेगी । निम्नलिखित चारों का अपने अपने अष्टमेशों से बलवान् होना आवश्यक है । (१) लग्न का स्वामी (२) लग्न नवांश का स्वामी (३) चन्द्र राशि का स्वामी (४) चन्द्र नवांश का स्वामी-तभी दीर्घायु होगी । ॥ १६ ॥