भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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२६० फलदीपिका लग्नेश्वरादतिबली निधनेश्वरोऽसौ केन्द्रस्थितो निधनरिः फगतैश्च पापैः । तस्यायुरल्पमथवा यदि मध्यमायु- रुत्साहसंकटवशात्परमायुरेति ॥१७॥ यदि लग्नेश की अपेक्षा अष्टमेश अत्यन्त बलवान् हो और केन्द्र में हो तथा पाप-ग्रह अष्टम और द्वादश में हों तो जातक अल्पायु होता है या मध्यम आयु ; यदि दीर्घायु प्राप्त भी करे तो जीवन संकट की दशा में बीतेगा। ॥ १७॥ नरोऽल्पायुर्योगे प्रथमभगणे नश्यति शने- र्द्वितीये मध्यायुर्यदि भवति दीर्घायुषि सति । तृतीये निर्याणं स्फुटशनिगुर्वर्कहिमगून् दशां भुक्तिं कष्टामपि वदति निश्चित्य सुमतिः ॥१८॥ नीचे लिखे चारों ग्रहों की राशि, अंश, कला, विकला जोड़ लीजिये : सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति तथा शनि उदाहरण के लिये जिसकी जन्मकुंडली का विचार कर रहे हैं उसके यह चारों ग्रह स्पष्ट जोड़े । सूर्य ७—२६ चन्द्र ११—२० गुरु ६—१४ शनि ०—७ योग २६—७ या २—७ अर्थात् मिथुन के सात अंश । यदि इस जातक की अल्पायु है तो गोचर वश जब शनि प्रथम बार