भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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तेरहवां अध्याय : आयुर्भाव २६१ मिथुन राशि के सात अंश पर आवेगा तब इसकी मृत्यु होगी । यदि मध्यायु है तो जब शनि द्वितीय बार मिथुन के सात अंश पर आवेगा तब मृत्यु होगी और यदि दीर्घायु है तो शनि जब गोचरवश तृतीय बार मिथुन के ७ अंश पर आवेगा तब मृत्यु होगी । यह विचार करते समय दशा और अन्तर्दशा का भी विचार कर लेना चाहिए । ॥१८॥ सपापो लग्नेशो रविहतरुचिर्नीचरिपुगो यदा दुःस्थानेषु स्थितमुपगतो गोचरवशात् । तनौ वा तद्योगो यदि निधनमाहुस्तनुभृतां नवांशाद्द्रेष्काणाच्छिशिरकरलग्नादपि वदेत् ॥१९॥ यदि लग्नेश किसी क्रूर ग्रह के साथ हो और नीच या शत्रु राशि में रहकर अस्त हो तो जब वह गोचरवश दुस्थान में जावे या लग्न में आवे या लग्न से सम्बन्ध करे तो जातक की मृत्यु होगी । जो विचार ऊपर लग्नेश द्वारा बताया गया है उसी प्रकार नवांश लग्न के स्वामी, द्रेष्काण लग्न के स्वामी तथा चन्द्र राशि के स्वामी से भी करना चाहिए ॥१९॥* शशी तदारूढगृहाधिपश्च लग्नाधिनाथश्च यदा त्रयोऽमी नोट : ऊपर के श्लोक १९ में कई बातें बता दीं । गोचरवश जब ६, ८, १२ वें या लग्न में ग्रह आवे — किन्तु प्रायः गोचरवश ग्रह इन स्थानों में घूमते ही रहते हैं । इसलिये हमारे विचार से यदि कोई व्यक्ति बीमार हो और सूक्ष्म काल निर्णय करना हो तभी इस श्लोक में दिया गया विचार काम में लाया जा सकता है ।