भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

२६२ फलदीपिका गुणाधिकाः सद्ग्रहदृष्टियुक्ता गुणाधिकं तं कथयन्ति कालम् ॥२०॥ जब चन्द्रमा, चन्द्रराशि का स्वामी और लग्नेश ये तीनों गोचर- वश बलवान् और शुभ-ग्रहों से दृष्ट हों तो वह समय जातक के लिए बहुत अच्छा अर्थात् शुभ व्यतीत होगा । यहाँ यह भी विचार कर लेना चाहिये कि लग्नेश, चन्द्रमा और चन्द्रराशि के स्वामी जहाँ जहां जन्म कुण्डली में बैठे है वहाँ वहां उन पर भी गोचर द्वारा शुभ-दृष्टि पड़ रही है या नहीं । उदाहरण के लिये किसी का सिंह लग्न है और सूर्य वृश्चिक में है तो न केवल गोचर वश सूर्य बलवान् होना चाहिये बल्कि जन्म कुण्डली में वृश्चिक में जो सूर्य है उस पर भी गोचरवश गुरु की दृष्टि आदि होनी चाहिये । ॥२०॥ लग्नाधिपोऽतिबलवानशुभैरदृष्टः केन्द्रस्थितः शुभखगैरवलोक्यमानः । मृत्युं विहाय विदधाति स दीर्घमायुः सार्द्धं गुणैर्बहुभिरूजितराजलक्ष्म्या ॥२१॥ यदि लग्न का स्वामी अति बलवान् हो, अशुभ ग्रहों से न देखा जाता हो, केन्द्र में बैठा हो और शुभ-ग्रहों से देखा जाता हो तो ऐसा बलवान् लग्नेश मारकों को रोकता है और दीर्घायु के साथ-साथ गुण, लक्ष्मी और ऐश्वर्य प्रदान करता है । ॥२१॥ सर्वातिशाय्यतिबलः स्फुरदंशुजालो लग्ने स्थितः प्रशमयेत् सुरराजमन्त्री ।