फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २६७ जब सूर्य रोग कारक ग्रह होता है तब निम्नलिखित रोगों की सम्भावना होती हैं, या यह समझिये कि सूर्य निम्नलिखित रोग और क्लेशों का कारक है । (१) पित्त (१) उष्ण ज्वर ( बुखार ) (३) शरीर में जलन रहना (४) अपस्मार (मिर्गी) (५) हृदय रोग (हार्ट डिजीज) (६) नेत्र रोग (७) नाभि से नीचे प्रदेश में या कोख में बीमारी (८) चर्मरोग (९) अस्थि स्रुति (१०) शत्रुओं से भय, (११) काष्ठ (१२) अग्नि, अस्त्र या विष से पीड़ा (१३) स्त्री या पुत्रों से पीड़ा (१४) चोर या चौपायों से भय (१५) सर्प से भय (१६) राजा, धर्म- राज (यम) भगवान्भूतेश (रुद्र) से भय होता है । चन्द्रमा निम्नलिखित रोग या कष्ट उत्पन्न करता है (१) निद्रा रोग (या तो नींद न आवे या बहुत नींद आवे या सोते सोते चलना इसे सन्यास रोग भी कहते हैं) (२) आलस्य (३) कफ, (४) अतिसार (संग्रहणी) (५) पिटक, कारबंकिल (६.) शीतज्वर (ठंड देकर जो बुखार आवे या ठंड के कारण जो बुखार हो (७) सींग वाले जानवर वा जल में रहने वाले जानवर मगर मच्छ आदि मे भय (८) मंदाग्नि (भूख न लगना) (९) अरुचि (यह भी मन्दाग्नि का एक प्रकार है—जब जठराग्नि के मन्द हो जाने से भूख नहीं लगती है तो भोजन की इच्छा नहीं होती है) (१०) स्त्रियों से व्यथा (११) पीलिया (१२) खून खराबी (१३) जल से भय । (१४) चित्त की थकावट । (१५) बाल ग्रह- दुर्गा-किन्नर- धर्मराज (यम )-सर्प और यक्षिणी से भय होता है ।। ३ ।। मंगल निम्नलिखित रोग और क्लेश उत्पन्न करता है । (१) तृष्णा- बहुत अधिक प्यास लगना (२) प्रकोप (वायु जनित या पित्त प्रकोप) (३) पित्तज्वर, अग्नि, विष या शस्त्र से भय (४) कुष्ठ (कोढ़) (५) नेत्र रोग- (६) गुल्म (पेट में फोड़ा या एपिन्डिसाइटीज) (७) अपस्मार (८) मज्जा रोग (हड्डी के अन्दर मज्जा होती है उसकी कमी से जो रोग हो जाते हैं (९) खुजली (१०) चमड़े में खुरदरापन (११)