फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ फलदीपिका देह भंग (शरीर का कोई भाग टूट जाय) (१२) राजा, अग्नि, और चोरों से भय (१३) भाई, मित्र, पुत्रों से कलह (१४) शत्रुओं से युद्ध (१५) राक्षस, गन्धर्व घोर ग्रह से भय और शरीर के ऊपर के भाग में बीमारियाँ होती हैं ॥४॥ बुध नीचे लिखे हुये रोग और क्लेश उत्पन्न करता है, (१) भ्रान्ति (बहम, ) सोचने में अव्यवस्था हो जाय, विचार में तर्क शक्ति न रहे, व्यर्थ की चिन्ता से मन उलटा पलटा सोचने लगे, मन में मिथ्या चिन्ता, विना कारण भय, आशंका बनी रहे, जो बात यथार्थ हो उसको भूल कर गलत बात याद रहे या गलत धारणा हो जावे —यह सब भ्रान्ति के लक्षण हैं (२) दुर्वचन बोलना— (३) नेत्र रोग (४) गले का रोग (५) नासिका रोग (६) वात, पित्त कफ इस त्रिदोष से उत्पन्न ज्वर (७) विष की बीमारी (८) चर्म रोग (९) पीलिया (१०) दुःस्वप्न, खुजली (११) अग्नि में पड़ने का डर—लोग जातक के साथ परुषता (कठोरता) का व्यवहार करें या जातक स्वयं अन्य लोगों के साथ परुषता का व्यवहार करे (१२) श्रम (परिश्रम का काम करना पड़े) (१३) गन्धर्व आदि से उत्पन्न रोग। यह सब बुध के कारण होते हैं। अब वृहस्पति के कारण जो रोग, क्लेश आदि होते हैं वह सब बताते हैं । (१) गुल्म, पेट का फोड़ा-रसोली आदि का रोग, एपिन्डसाइटोज (२) अंतड़ियों का ज्वर (मोती झरा) (३) मूर्च्छा यह सब रोग कफ के दोष से होते हैं क्योंकि कफ का अधिष्ठाता बृहस्पति है (४) कान के रोग (५) देव स्थान सम्बन्धी पीड़ा अर्थात् मन्दिर आदि की जायदाद लेकर मुकदमे बाजी (६) ब्राह्मणों के शाप से कष्ट (७) किसी खजाने, ट्रस्ट या बैंक के मामलों के कारण कलह या अदालती कार्रवाई । (८) विद्याधर, यक्ष-किन्नर, देवता, सर्प आदि के द्वारा किया हुआ उपद्रव (९) अपने गुरुओं—माननीयों तथा बड़ों के साथ किया हुआ अभद्र या अशिष्ट व्यवहार या उनके