फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २६९ प्रति कर्तव्य पालन न किया हो तो उस अपराध का दंड बृहस्पति की दशा, अन्तर्दशा में होता है यह दैवी नियम है ।। ६ ।। अब शुक्र ग्रह के कारण क्या क्या रोग, क्लेश आदि होते हैं वह बताये जाते हैं :—(१) रक्त की कमी के कारण पीलापन (२) कफ और वायु के दोष से नेत्र रोग, मूत्र रोग, प्रमेह जननेन्द्रिय आदि में रोग—पेशाब करने में कठिनता या कष्ट (उपदंश, सुजाक आदि के कारण या प्रोस्ट्रेट ग्लैण्ड बढ़ जाने की वजह से) (४) वीर्य की कमी (५) संभोग में अक्षमता (६) अत्यन्त संभोग के कारण शरीर में कमजोरी तथा चेहरे पर कान्ति हीनता (७) शोष (शरीर का सूखना) (८) योगिनी, यक्षिणी एवं मातृगण से भय । (९) शुक्र क्लेश कारक होने से मित्रों से मित्रता भी टूट जाती है। अब उन रोग और क्लेशों का वर्णन करते हैं जो शनि के कारण उत्पन्न होते हैं :— (१) वात और कफ के द्वारा उत्पन्न रोग (२) टांग में दर्द या लंगड़ाना, (३) अत्यधिक श्रम के कारण थकान (४) भ्रान्ति (भ्रान्ति किसे कहते है? जहाँ बुध के रोग बताये गये हैं वहां विस्तार से समझाया गया है)। (५) कुक्षि (काँख में रोग) (६) शरीर के भीतर बहुत उष्णता हो जाय (७) नौकरों से कष्ट—नौकर नौकरी छोड़ कर चलें जायें या धोखा या दगा दें। (८) भार्या और पुत्र सम्बन्धी विपत्ति (९) अपने शरीर के किसी भाग में चोट (१०) हृदय ताप (मान- सिक चिन्ता) पेड़ या पत्थर से चोट (११) पिशाच आदि की पीडा (१२) आपत्ति ॥८॥ अब राहु ग्रह के कारण क्या क्लेश, रोग चिन्ता आदि होते हैं वह बताते हैं:—(१) हृदय रोग (२) हृदय में ताप (जलन) (३) कोढ़ (४) दुर्मति (५) भ्रान्ति (६) विष के कारण उत्पन्न हुई बीमारियां (७) पैर में पीड़ा या चोट (८) स्त्री, पुत्र को कष्ट या उनके कारण कष्ट (९) सर्प और पिशाचों से भय ।