फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 271, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें२७० फलदीपिका अब केतु क्या शारीरिक या मानसिक कष्ट, क्लेश उत्पन्न करता है यह बताते हैं—ब्राह्मणों और क्षत्रियों से कलह के कारण कष्ट, शत्रुओं से भय। अब गुलिक के कारण क्या कष्ट होते हैं यह बताते हैं। गुलिक को ही मान्दि भी कहते हैं। गुलिक यदि छठे घर में हो या छठे ग्रह के स्वामी के साथ हो तो शरीर में पीड़ा, किसी स्वजन की मृत्यु और प्रेत से भय होता है ॥९॥ मन्दारान्वितवोक्षिते व्ययधने चन्द्रारुणौ चाक्षिरुक् शौर्याद्याङ्गिरसो यमारसहिता दृष्टा यदि श्रोत्ररुक् । सोग्रे पञ्चमभे भवेदुदररुग्रन्ध्रारिनाथान्विते तद्वत्सप्तमनैधने सगुदरुच्छुक्रे च गुह्यामयः ॥१०॥ षष्ठेऽर्केऽप्यथवाष्टमे ज्वरभयं भौमे च केतौ व्रणं शुक्रे गुह्यरुजं क्षयं सुरगुरौ मन्दे च वातामयम् । राहौ भौमनिरीक्षिते च पिलकां सेन्दौ शनौ गुल्मजं क्षीणोन्दौ जलभेषु पापसहिते तत्स्थेऽम्बुरोगं क्षयम् ॥११॥ अब रोग के कुछ अन्य योग बताये जाते हैं:—(१) यदि चन्द्रमा और सूर्य बारहवें या दूसरे स्थान में हों और उनको मंगल और शनि देखते हों तो नेत्र रोग होता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि सूर्य चन्द्र दोनों एक साथ या एक दूसरे घर में हो और उनको मंगल और शनि दोनों पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो संभवतः उस आँख से दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जाय। दूसरा स्थान दाहिने नेत्र का है इस कारण दाहिने नेत्र में रोग होगा । ऊपर जो योग बताया गया है वह यदि बारहवें घर में होगा तो बाएँ नेत्र की दृष्टि नष्ट होगी। इसी प्रकार यदि सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों में से कोई—एक दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो और उसको शनि या मंगल देखता हो