फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय : रोगनिर्णय २७१ तो दूसरे में सूर्य या चन्द्र बैठने से दाहिने नेत्र का रोग होगा और बारहवें घर में सूर्य या चन्द्र बैठने से और उस को मंगल या शनि के देखने से बायें नेत्र में रोग होगा। दूसरे और बारहवें घर को नेत्र स्थान कहते हैं। नेत्र स्थान में बैठे हुए सूर्य या चन्द्र को केवल मंगल या केवल शनि देखे तो थोड़ा कष्ट और यदि मंगल और शनि दोनों देखें तो विशेष कष्ट समझना चाहिये ऐसा हमारा अनुभव है। हमारा यह भी अनुभव है कि यदि नेत्र स्थान में सूर्य, चन्द्र न भी बैठे हों अन्य पाप ग्रह बैठे हों या पाप ग्रह की दृष्टि हो तो भी नेत्र की दृष्टि में कमी हो जाती है। (२) यदि तीसरे और ग्यारहवें घर और बृहस्पति-मंगल शनि से युत या दृष्ट हों तो कान का रोग होता है। तीसरे से दाहिने कान का विचार किया जाता है ग्यारहवें से बाँये कान का। सुनना (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन पाँच गुणों में से) शब्द से सम्बन्ध रखता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह पाँच तत्त्व हैं। सूर्य और मंगल ग्रह का अग्नि तत्त्व, चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्त्व, बुध का पृथिवी तत्त्व, शनि का वायु तत्त्व और बृहस्पति का आकाश तत्त्व है। शब्दगुण का अधिष्ठाता आकाश तत्त्व है। आकाश तत्त्व बृहस्पति से सम्बन्धित होने के कारण यह कहा गया है कि यदि बृहस्पति मंगल, शनि से (मंगल से या शनि से या शनि, मंगल दोनों से) पूर्ण दृष्टि से देखा जाता हो, या मंगल, शनि के साथ हो तो कान के रोग अथवा बहरापन होता है। यहाँ तारतम्य से यह विचार कर लेना चाहिये कि तृतीय और एकादश घर जितने निर्बल होंगे और जितनी अधिक पाप दृष्टि इन दोनों पर पड़ेगी—या जितने अधिक पाप ग्रहों के साथ ये तथा बृहस्पति (शब्द गुण का अधिष्ठाता होने के कारण) होंगे उतना ही तीव्र (अधिक) कान का रोग होगा। मंगल पित्त प्रधान है इस लिए मंगल की युति या दृष्टि पित्त के कारण या फोड़ा फुंसी, रक्त स्राव आदि का रोग कान में