फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७५ (क) (१) जो ग्रह अष्टम में होते हैं या अष्टम को देखते हैं—उनमें जो बलवान् होता है—उस ग्रह के रोग से जातक की मृत्यु होती है । आठवाँ आयु का स्थान है । ऊपर बता चुके हैं कि कौन-सा ग्रह किस रोग का कारक है । (२) यदि आठवें भाव में ग्रह हो या ग्रह देखते हों तब तो किस प्रकार के रोग से मृत्यु होगी यह ऊपर बताया परन्तु आठवें घर में कोई ग्रह न हो और न कोई ग्रह आठवें घर को देखता हो—ऐसी स्थिति में किस रोग से मृत्यु होगी । यह बताते हैं कि आठवें घर के जो रोग बताये गये हैं—उनसे या आठवें घर का मालिक जिस राशि या भाव में बैठा हो उसके दोष से—उदाहरण के लिये आठवें घर का मालिक पाँचवें घर में हो तो उदर (पेट के) रोग से, चौथे घर में बैठा हो तो हृदय रोग से—यदि अष्ट- मेश सूर्य या मंगल हां तो पित्तज रोग, से, शनि हो तो वात रोग से, इत्यादि । जन्म लग्न (द्रेष्काण) से जो २२वां द्रेष्काण होता है उसका स्वामी भी मृत्यु कारक होता है । ऊपर जो योग अष्टम भाव सम्बन्धी बताये गये हैं वह लागू न हों तो जन्म द्रेष्काण से जो २२वाँ द्रेष्काण हो—उस २२वें द्रेष्काण का जो स्वामी हो—उस स्वामी के जो रोग हों—उनमें से किसी रोग के कारण मृत्यु होती है ॥१२॥ (ख) जो ग्रह आठवें घर में हों या आठवें घर को देखते हैं उन ग्रहों में जो बलवान् हो उसके रोग/दोष से मृत्यु होती है । यदि कोई ऐसा ग्रह न हो तो अष्टम भाव में जो राशि हो उसके जो रोग हैं उनके कारण मृत्यु होती है । '१३वाँ श्लोक एक प्रकार से १२वें श्लोक की ही व्याख्या है । ।। १३ ।। (१) सूर्य—अग्नि, उष्णज्वर, पित्त या शस्त्र से मृत्यु करता है । (२) चन्द्रमा—विषूचिका (हैजा), जलोदर, Oedema (इस रोग में हाथ, पैर या अन्य स्थान में पानी इकट्ठा हो जाता है) जल की