फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 277, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें२७६ फलदीपिका बीमारियाँ (प्ल्यूरेसी या अन्य बीमारी जिसमें जल कहीं इकट्ठा हो जावे, यक्ष्मा टी. बी. आदि रोगों से आयु समाप्त करता है। (३) मंगल--जलने से (अग्नि प्रकोप, बिजली आदि भी इसी के अन्तर्गत आ जाती है), रक्त विकार या रक्त बहने से, क्षुद्र अभिचार (जादू, टोना, मारण आदि के अनुष्ठानों आदि) के कारण, मृत्यु करता है। (४) बुध--पाण्डु (पीलिया) या रक्त की कमी, भ्रान्ति (स्नायु सम्बन्धी विकार) आदि रोगों से जातक के प्राण हरण करता है। रक्त का कम बनना जिससे 'पाण्डु' आदि रोग होते हैं--यकृत की ख़राबी से होते हैं। (५) बृहस्पति--कफ का अधिष्ठाता है और कफ से मृत्यु करता है। इसमें विशेष कष्ट नहीं होता। (६) शुक्र--जब प्राणहरण करता है तो इसमें हेतु यह होता है कि अतिस्त्री प्रसंग के कारण वीर्य की कमी से शरीर निस्तेज हो जाने से बीमारी का शिकार हो जाता है। मूत्र रोग, जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोग भी शुक्र के अन्तर्गत आ जाते हैं। (७) शनि--सन्निपात. वातजरोग (लकवा आदि के द्वारा) आदि से मृत्यु करता है। ॥ १४ ॥ (८) राहु--कुष्ठ (कोढ़ से) या food-poisoning विष या जर्म्स (रोग कीटाणु) युक्त वस्तु खाने से, सर्प आदि विषैले जन्तुओं के काटने से, जिस रोग में शरीर पर ददौड़े, फुंसिया आदि हो जावें, उससे मृत्यु करता है। (९) केतु--जब मृत्यु करता है तो दुर्मरण होता है। दुर्मरण का अर्थ है अपमृत्यु (जैसा आकस्मिक मोटर, रेल आदि से, मकान के गिरने से, कुचल जाने से, कोई कत्ल करदे, यह सब दुर्मरण के उदाहरण हैं)। शत्रुओं के विरोध से, कीड़ों से या शरीर में किसी कीड़े या जन्तु के