फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ फलदीपिका। (९) धनु—पेड़ के कारण (कोई पेड़ गिर जाने से या किसी पेड़ को काटते समय), जल, लकड़ी के कारण (लकड़ी चीरते समय, या लकड़ी की चोट से), शस्त्र से । (१०) मकर—शूल (पेट का दर्द-एपिण्डीसाइटिज़ आदि, पेट में फोड़ा आदि, colic pain) अरुचि-मन्दाग्नि या बुद्धिभ्रम (नर्वस- स्नायु मण्डल की अव्यवस्था या रोग के कारण संयत विचार करने की शक्ति जब नष्ट हो जाती है) आदि से । (११) कुंभ--खाँसी, ज्वर, क्षय । (१२) मीन—पानी से, पानी में डूबने से, जल रोगों से । (ङ) यदि आठवें घर का मालिक पापग्रह हो और आठवें घर में पापग्रह बैठे भी हों (या एक भी पापग्रह अष्टम में हो) तो शस्त्र, अग्नि, व्याघ्र, सर्प आदि की पीड़ा होती है। यदि केन्द्र में बैठे हुए दो पाप ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो सरकार की नाराज़गी से, शस्त्र, विष, अग्नि आदि के कारण मृत्यु होती है। ॥ २० ॥ (च) यदि (१) बारहवें घर का मालिक सौम्य ग्रह की राशि या सौम्य ग्रह के नवांश में हो या सौम्य ग्रह के साथ बँठा हो अथवा (२) बारहवें घर में सौम्य ग्रह बँठा हो और बारहवें घर का मालिक भी सौम्य ग्रह हो तो मरते समय विशेष क्लेश या पीड़ा नहीं होती । यदि इससे उल्टा हो अर्थात् (१) बारहवें घर का मालिक क्रूर ग्रह की राशि या क्रूर ग्रह के नवांश में बैठा हो या क्रूर ग्रह के साथ हो अथवा (२) बारहवें घर में क्रूर ग्रह बैठा हो, बारहवें घर को क्रूर देखते हों तो कष्ट, पीड़ा क्लेश के साथ मृत्यु होती है । ॥ २१ ॥