फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ फलदीपिका यदि ग्रह उच्च राशि का हो तो देव भूमि (स्वर्ग), नीच राशि या शत्रु राशि का हो तो द्वीपान्तर, यदि ग्रह अपनी राशि या मित्र राशि का हो तो भारत वर्ष में ही समझना चाहिये । २५॥ (घ) अब भारत वर्ष में किस प्रदेश का किस ग्रह से विशेष सम्बन्ध है यह बताते हैं (i) सूर्य— पर्वत और जंगल (ii) चन्द्रमा—पुण्य नदी (जिनमें स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है—यथा गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि (iii) मंगल —कीकट देश, दरिद्र तथा कुत्सित देश— आजकल जिस प्रदेश को बिहार कहते हैं—उसका एक भाग भी "कीकट" देश माना जाता है (iv) बुध—पुण्य स्थल, जिन्हें तीर्थ कहते हैं, यथा श्री रामेश्वरम्, श्री रंगम्, द्वारका, अयोध्या, आदि (v) बृहस्पति आर्यावर्त—हिमालय और विन्ध्य जिसकी उत्तर और दक्षिण की सीमा हैं तथा पूर्व और पश्चिम की सीमा समुद्र तक है (vi) शुक्र जो स्थान चन्द्रमा के बताये गये हैं, वही (vii) शनि—निन्दनीय स्थान, म्लेच्छ भूमि ॥२६॥ (ङ) ऊपर श्लोक २४ में पूर्व जन्म के विषय में बताया है । अब पुनः उसी प्रसंग में कहते हैं कि यदि जिन ग्रहों का ज़िक्र ऊपर श्लोक २४ में किया गया है—वे स्थिर राशि या स्थिर नवांश में हों और साथ ही साथ पृष्ठोदय राशि में भी हों और अधो मुख राशि में भी हों तो जन्म वृक्ष (पेड़) लता (बेल) आदि में हुआ था (नवम भाव के विचार से) या वृक्ष, लता आदि रूप में होगा (पांचवे भाव के) विचार से) । यदि स्थिर नवांश. पृष्ठोदय आदि में न हो तो मनुष्य योनि (मनुष्य शरीर) समझना चाहिये । अर्थात् ऊर्ध्वास्य राशि हो, शीर्षोदय राशि हो, चर राशि, चरनवांश का सम्बंध हो तो (नवम का ऐसा हो तो पूर्व जन्म में) मनुष्य ही था पंचम का ऐसा सम्बन्ध हो तो भविष्य जन्म या पुनर्जन्म मे मनुष्य ही होगा । मनुष्य का अर्थ मनुष्य योनि