भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 287

२८६ फलदीपिका तद्भावनाशं कथयन्ति तज्ज्ञाः शुभेक्षितस्तद्भवनस्य सौख्यम् ॥५॥ भावाधीशो च भावे सति बलरहिते च ग्रहे कारकाख्ये पापान्तःस्थे च पापैःररिभिरपि समेतेक्षिते नान्यखेटैः । पापैस्तद्बन्धुमृत्युव्ययभवनगतैस्तत्त्रिकोणस्थितैर्वा वाच्या तद्भावहानिः स्फुटमिह भवति द्वित्रिसंवादभावात् ॥ तत्तद्भावपराभवेश्वरखरद्रेष्काणपा दुर्बला भावार्थ्यष्टमकामगा निजदशायां भावनाशप्रदाः । पापा भावगृहात् त्रिशत्रुभवगाः केन्द्रत्रिकोणो शुभाः 'वीर्याढ्याः खलु भावनाथसुहृदो भावस्य सिद्धिप्रदाः ॥७॥ (i) भाव का शुभाशुभ विचार इस पन्द्रहवें अध्याय में बताया गया है। किसी भाव का विचार करना हो तो सर्वप्रथम निम्नलिखित सिद्धांत लागू करने चाहिए। जिन भावों में शुभग्रह बैठे होते हैं, जो भाव शुभग्रह से दृष्ट होते हैं वह उत्तम फल देते हैं। जो भाव अपने स्वामी के सहित होता है वह शुभ फल देता है। यदि कोई भाव अपने स्वामी से दृष्ट हो तो भी शुभ फल देगा। यहाँ पूर्ण दृष्टि का पूर्ण फल, तीन चौथाई दृष्टि का तीन चौथाई फल, आधी दृष्टि का आधा फल और चौथाई दृष्टि का चौथाई फल समझना चाहिए। एक टीकाकार ने यह भी अर्थ किया है कि शुभ भवनों के स्वामी भी किसी भाव को देखें तो उस भाव की समृद्धि करेंगे किन्तु हमारे विचार से यहां "शुभ" शब्द का अर्थ नैसर्गिक शुभता है--भावाधिप होने के कारण शुभता नहीं। उदाहरण के लिए नवमेश, दशमेश, शनि भावाधिप होने के कारण शुभ हुआ, किन्तु नैसर्गिक क्रूर है। तुला लग्न वाले को नैसर्गिक रूप से