फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २८७ बृहस्पति शुभ हुआ, यद्यपि तृतीय और छठे का मालिक होने के कारण उसे शुभ नहीं कहेंगे । हमारे विचार से ग्रन्थकार का मत नैसर्गिक शुभ और पाप का भेद बताना है। यदि पापग्रह किसी भवन का स्वामी है और उस भवन में बैठा है तो उस भाव को बनायेगा, बिगाड़ेगा नहीं । इसी प्रकार पापग्रह यदि अपने भाव को (जिस राशि का वह स्वामी है) पूर्ण दृष्टि से देखे तो उस भाव की वृद्धि ही करेगा । किन्तु ऊपर की पंक्तियों में जो शुभ फल उत्पन्न करने का सिद्धान्त बताया गया है, वह तभी ठीक बैठता है, जब ग्रह नीच, अस्त या शत्रुक्षेत्री न हो । यदि इन तीनों दोषों में से एक, दो, या तीनों दोषों से युक्त हो तो शुभता प्रदान करने की शक्ति कम हो जाती है या नहीं रहती है । ॥१॥ (ii) जिस भाव का विचार करना हो, उस भाव को थोड़ीं देर के लिए लग्न मान लीजिए और फिर विचार कीजिए कि उस विचारणीय भाव से प्रथम, द्वितीय, चंतुर्थ पंचम, सप्तम, नवम और दशम में उस विचारणीय भाव का स्वामी और शुभग्रह हैं या नहीं । यदि इन स्थानों में शुभग्रह हैं तो उस भाव की समृद्धि होगी । यह भी देखना चाहिए कि विचारणीय भाव से १, २, ४, ५, ७, ९, १० पर पापग्रहों की दृष्टि तो नहीं हैं या पापग्रह बैठे तो नहीं हैं। यदि इन निर्दिष्ट स्थानों में केवल शुभग्रह बैठे होंगे और विचारणीय भाव का स्वामी बैठा होगा तो पूर्ण शुभ फल; यदि इन स्थानों में पापग्रह बैठे होंगे तो पूर्ण अशुभ फल । यदि कुछ शुभग्रह, कुछ पापग्रह मिले जुले बैठे होंगे तो मिला जुला फल होगा—कुछ अच्छा, कुछ ख़राब । प्रत्येक भाव का विचार करने के लिए उससे भिन्न भिन्न स्थानों पर शुभ या पाप कैसे ग्रह बैठे हैं इसका विचार कर अन्तिम परिणाम पर पहुँचना चाहिए । ॥२॥ (iii) यदि किसी भाव का स्वामी (१) अष्टम स्थान में गया हो