फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९१ (vii) जिस भाव का विचार करना हो उसका नाश कौन-कौन से ग्रह करते हैं और उस भाव को पुष्ट कौन-कौन से करते हैं— यह बताते हैं। भाव को नाश करने वाले निम्नलिखित हैं :- (१) विचारणीय भाव से अष्टम भाव का स्वामी। (२) विचारणीय भाव से २२वें द्रेष्काण का स्वामी। (३) विचारणीय भाव से छठे, सातवें, आठवें भाव के स्वामी—यदि ये दुर्बल हों। यह सब ग्रह अपनी-अपनी दशा में अन्तर्दशा में विचारणीय भाव सम्बन्धी हानि करेंगे। अब यह बताते हैं कि किसी भाव की पुष्टि किस-किस ग्रह की दशा में होगी। (१) विचारणीय भाव से यदि तीसरे, छठे, ग्यारहवें, पापग्रह बैठे हों तो वह अपनी-अपनी दशा में विचरणीय भाव-सम्बन्धी सुख उत्पन्न करेंगे। (२) विचारणीय भाव से प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम और दशम स्थान में यदि शुभग्रह बैठे हों तो वह विचारणीय भाव सम्बन्धी वृद्धि करेंगे। (३) जिस भाव का विचार करना हो उस भाव के स्वामी के जो शत्रु हैं—वे अपनी दशा—अन्तर्दशा में विचारणीय भाव को बिगाड़ेंगे और जो मित्र हैं—वे यदि बलवान् हों तो विचारणीय भाव को पुष्टि प्रदान करेंगे। इस अन्तिम सिद्धान्त का एक उदाहरण दिया जाता है। (९) सूर्य, बृहस्पति, (१०) सूर्य, बुध, बृहस्पति, शनि, (११) बृहस्पति, (१२) शनि। प्रथम भाव का कारक सूर्य। धनभाव का कारक बृहस्पति इत्यादि।