फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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उदाहरण केलिए साथ की कुंडली में लग्न भाव का विचार करना है तो शनि सूर्य का शत्रु है—इस कारण शनि की दशा-अन्तर्दशा में शरीर-कष्ट होगा । और बृहस्पति सूर्य का मित्र है इस कारण बृहस्पति की दशा अन्तर्दशा में शरीर का सुख होगा । ।।७।।
राश्तोर्जन्मविलग्नयोर्धृ'तिपतिर्मृ'त्युस्थतद्वीक्षकौ मन्दः क्रूरदृगाणपो गुलिकपस्तैर्यु'क्तराश्यंशपा । राहुश्चैष सुदुर्बलः, स जनने भावानभीष्टस्थितः पापालोकितसंयुतो निजदशायां भावनाशावहाः ॥८॥
निम्नलिखित ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा में भाव का नाश करते हैं। (१) जन्मलग्न से तीसरे भाव का स्वामी (२) जन्म राशि से तृतीय भवन का स्वामी (३) जो ग्रह अष्टम में बैठा हो (४) जो ग्रह अष्टम को देखता है (५) शनि (६) २२वें द्रेष्काण का स्वामी (७) जिस घर में मान्दि हो उसका स्वामी (८) ऊपर जो सात ग्रह बताये गये हैं वह जिन राशि और अंशों में हों उनके स्वामी (९) दुर्बल राहु यदि वह लग्न से ८वें या १२वें घर में बैठा हो या पाप-ग्रह से युत या दृष्ट हो । इस श्लोक में यह नहीं बताया गया कि किस भाव का नाश करता है। किन्तु पिछले श्लोकों में यह बताया जा चुका है कि पाप-ग्रह जहां बैठते हैं जिसको देखते हैं जिसके बगल में बैठते हैं उन भावों को नष्ट करते हैं। यही सिद्धांत इस श्लोक में भी लगाने चाहियें।