भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 684 में से

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पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९७ भाव सम्बन्धी अधिक फल दिखावेंगे और ग्रह जितना भाव मध्य से दूर होगा उतना ही उस भाव सम्बन्धी कम फल दिखावेगा । यदि सूक्ष्म विचार करना हो तो त्रैराशिक से यह गणित कर लीजिये कि कितना फल दिखावेगा ॥ १४ ॥ सूर्यादात्मपितृप्रभाव्निरुजां शक्तिं श्रियं चिन्तयेत् चेतोबुद्धिनृपप्रसादजननीसंपत्करश्चन्द्रमाः । सत्वं रोगगुणानुजावनिरिपुज्ञातीन्धरासूनुना विद्याबन्धुविवेकमातुलसुहृद्वाक्कर्मकृद्बोधनः ॥१५॥ प्रज्ञावित्तशरीरपुष्टितनयज्ञानानि वागीश्वरात् पत्नीवाहनभूषणानि मदनव्यापारसौख्यं भृगोः । आयुर्जीवनमृत्युकारणविपद्भृत्यांश्च मन्दाद्वदेत् सर्पेणैव पितामहं तु शिखिना मातामहं चिन्तयेत् ॥१६॥ सूर्य से आत्मा, पिता, प्रभाव, स्वास्थ्य, शक्ति (ताक़त), और लक्ष्मी का विचार करना चाहिये। चन्द्रमा से मन, बुद्धि राजा की कृपा, माता और सम्पत्ति का विचार करिये । मंगल से सत्व (ताकत, हिम्मत) रोग, गुण, छोटे भाई, पृथ्वी, शत्रु और ज्ञाति (चचेरे भाई आदि) का विचार करना चाहिये । विद्या, बन्धु, विवेक, मामा, मित्र, वाणी और कार्यक्षमता का विचार बुध से करे । ॥१५॥ संस्कृत में शब्द आया है कि कर्म का विचार बुध से करे । क्या बुध कर्म करने वाला है ? इसका क्या आशय है ? बुध स्नायुमंडल का स्वामी है । स्नायुमंडल पुष्ट होने से मनुष्य कर्मशील होता है, कर्म में प्रवृत्त होता है। काम काज में व्यस्त रहता है । स्नायुमंडल

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