भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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२९८ फलदीपिका कमजोर होने से काम करने की प्रवृत्ति संकुचित होती है। कार्य करने की शक्ति कम होने से कार्य करने की रुचि भी कम होती है। दशम स्थान—दसवें घर को कर्म स्थान कहते हैं। कर्म या कार्य का दशम स्थान से सम्बन्ध होने के कारण ही—दशम स्थान के कारक ग्रहों में बुध भी एक कारक माना गया है। ॥१५॥ प्रज्ञा, धन, शरीर पुष्टि, पुत्र और ज्ञान का विचार बृहस्पति से करे। पत्नी, सवारी, आभूषण, स्त्री-पुरुष प्रेम सम्बन्ध और सुख का कारक शुक्र है। आयु, जीवन (जीविका), मृत्यु का कारण, विपत्ति और नौकरी का विचार शनि से करना चाहिये। राहु से बाबा का और केतु से नाना का विचार किया जाता है। ॥१६॥ द्युमणिरमरमन्त्री भूसुतः सोम सौम्यौ गुरुरिनतनयारौ भार्गवो भानुपुत्रः । दिनकरदिविजेड्यौ जीवभानुज्ञमन्दाः सुरगुरुरिनसूनुः कारकाः स्युर्विलग्नात् ॥१७॥ जब किसी बात का विचार किया जाता है तो प्रायः ज्योतिषी भाव और भावेश को देखते हैं। परन्तु जितनी मुख्यता भाव और भावेश की है उतनी ही कारक ग्रह की भी है। उदाहरण के लिये किसी का सप्तम और सप्तमेश तो बिगड़ा है किन्तु शुक्र बड़ा बलवान् है तो शुक्र के कारण स्त्री सुख प्राप्त होगा। अथवा मान लीजिये कि सप्तम और सप्तमेश तो अच्छे हैं और शुक्र बिगड़ा है तो शुक्र के बिगड़ने के कारण उतना स्त्री सुख नहीं होगा जितना होना चाहिये। किन वस्तुओं का कौन सा ग्रह कारक होता है यह पिछले श्लोकों में बताया गया है। अब उसी बात को भावों के दृष्टिकोण से बताते हैं कि किस भाव का कौन सा ग्रह या कौन से ग्रह कारक होते हैं। जन्म