भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९९ कुण्डली में बारह भाव होते हैं । बारहों भावों के क्रमशः निम्नलिखित कारक हैं : (१) सूर्य (२) बृहस्पति (३) मंगल (४) चन्द्र और बुध (५) बृहस्पति (६) मंगल और शनि (७) शुक्र (८) शनि (९) बृहस्पति और सूर्य (१०) सूर्य, बुध, बृहस्पति और शनि (११) बृहस्पति और (१२) शनि । ॥ १७ ॥ सुहृदरिपरकीयस्वर्क्षतुङ्गस्थितानां फलमनुपरिचिन्त्यं लग्नदेहादिभावैः । समुपचयविपत्ती सौम्यपापेषु सत्यः कथयति विपरीतं रिःफषष्ठाष्टमेषु ॥१८॥ किसी ग्रह का फल देखना हो तो यह देखिये कि वह लग्न आदि द्वादश भावों में से किस भाव में है और मित्र राशि में है, या स्वराशि में है, या उच्च राशि में या शत्रु राशि में । सत्याचार्य के मत से जिस घर में सौम्यग्रह बैठते हैं उस घर की वृद्धि करते हैं और जिस घर में पाप-ग्रह बैठते हैं उस घर का नाश करते हैं लेकिन छठे, आठवें, बारहवें में इससे उलटा समझना चाहिये । ॥ १८ ॥ पापग्रहाः षष्ठमृतिव्ययस्था- स्तद्भाववृद्धिं कलयन्ति दोषैः । शुभास्तु तद्भावलयं हि तस्माच्छत्र्वादि भावोत्फलप्रणाशः ॥१९॥ पापग्रह यदि लग्न से छठे, ८वें या १२वें हो तो उन भावों के उन दुष्ट फल को बढ़ाते हैं । शुभ ग्रह इन भावों में हों तो उस भाव के