भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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३०० फलदीपिका प्रभाव को लय (नाश) करते हैं। इस कारण इन भावों में शुभ-ग्रह के होने से इन भावों के दुष्ट फल का नाश होता है। यद्यपि मन्त्रेश्वर महाराज के मत से त्रिक स्थान का शुभग्रह त्रिक स्थान के दोष को अवश्य कम करता है परन्तु त्रिक स्थान में बैठने से ग्रह स्वयं दूषित हो जाता है और अपनी दशा-अन्तर्दशा में पूर्ण शुभ फल देने में असमर्थ होता है। ॥ १९ ॥ भावस्य यस्यैव फलं विचिन्त्यं भावं च तं लग्नमिति प्रकल्प्य । तस्माद्वदेद्द्वादशभावजानि फलानि तद्रूपधनादिकानि ॥२०॥ इस श्लोक में एक नयी बात बताते हैं। जिस भाव का विचार करना हो उसको लग्न मान कर एक नयी कुण्डली बना लीजिये और फिर इसी प्रकार विचार कीजिये जैसे कि जन्म-कुण्डली में विचार किया जाता है। उदाहरण लिये आपको अपने पुत्र की स्त्री का विचार करना है तो आपके जन्म-लग्न से पंचम को (क्योंकि पुत्र का विचार पंचम से किया जाता है) पुत्र स्थान मानकर उस पंचम से सप्तम से पुत्र वधू का विचार कीजिये। अथवा दूसरा उदाहरण लीजिये। आपको अपनी पत्नी के धन का विचार करना है तो सप्तम से दूसरा अर्थात् अपने अष्टम से अपनी स्त्री के धन का विचार कीजिये। पत्नी के छोटे भाई का विचार करना है तो अपने सप्तम (पत्नी) से तृतीय—(छोटा) भाई अर्थात् अपने जन्म लग्न से नवम स्थान से पत्नी के छोटे भाई का विचार कीजिये। इस प्रकार किसी भी भाव को लग्न मान कर उससे द्वादश भावों का विचार किया जा सकता है। यह ऊपर के उदाहरण से स्पष्ट है। ॥ २० ॥