फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता ३०१ एवं हि तत्कारकतो विचिन्त्यं पितुश्च मातुश्च सहोदरस्य । तन्मातुलस्यापि सुतस्य पत्यु- र्भृत्यस्य सूर्यादिखगस्थितर्क्षात् ॥२१॥ एक अन्य प्रकार और बताते हैं । यदि पिता का विचार करना है तो सूर्य जिस भाव में है उसको लग्न मान कर सूर्य से द्वितीय से पिता का धन, सूर्य से तृतीय से पिता का छोटा भ्राता आदि पिता के बारहौं भावों का विचार कीजिये । माता का विचार करना है तो चन्द्र-स्थित राशि को लग्न मान कर। भाई का विचार करना है तो मंगल-स्थित राशि को लग्न मान कर, मामा का विचार करना हो तो बुध-स्थित राशि को लग्न मान कर, पुत्र का विचार बृहस्पति वाली राशि को लग्न मान कर, स्त्री का विचार शुक्र-स्थित राशि को लग्न मान कर और नौकर का विचार शनि-स्थित राशि को लग्न मान कर उनके बारहों भावों का विचार करना चाहिये । ॥ २१ ॥ सूर्यस्थितर्क्षाज्जनकस्वरूपं वृद्धिं द्वितीयेन तु तत्प्रकाशम् । [