फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ फलदीपिका पुण्यं शुभं तत्पितरं शुभेन व्यापारमस्यैव हि कर्मभावात् । लाभं ह्युपान्त्यात् क्षयमन्त्य- भावाच्चन्द्रादिकानां फलमेवमाहुः ॥२४॥ सूर्य जिस राशि में है उससे पिता के स्वरूप का विचार करिये। सूर्य-स्थित राशि से दूसरे भाव से पिता के धन और ख्याति का विचार करिये। सूर्य जिस राशि में है उससे तीसरे से पिता के भाई और गुणों का विचार करे। पिता के सुख और पिता की माता का विचार सूर्य- स्थित राशि हो उससे चौथे घर से करना चाहिये । ॥ २२ ॥ सूर्य-स्थित राशि से पंचम से पिता की बुद्धि और प्रसाद (प्रसन्नता) का विचार करे। सूर्य-स्थित राशि से छठे से पिता के दोष, शत्रु और रोग का विचार करे। सूर्य-स्थित, राशि से सप्तम से पिता के मदन- व्यापार (स्त्री-पुरुष प्रेम) का, और सूर्य-स्थित राशि से अष्टम से पिता के दुःख, आयु तथा मृत्यु का विचार करे। ॥ २३ ॥ सूर्य-स्थित राशि अर्थात् सूर्य जिस राशि में हो उससे नवम से पिता का पुण्य, पिता का शुभ, पिता के पिता का विचार करना चाहिये। और सूर्य स्थित राशि से दशम से पिता के व्यापार का विचार करना चाहिये। सूर्य-स्थित राशि से एकादश से पिता के लाभ का और सूर्य- स्थित राशि से द्वादश से पिता के क्षय (व्यय) का विचार करना चाहिये। जैसे सूर्य स्थित राशि से विविध भावों से पिता के विविध भावों का विचार किया जाता है वैसे ही चन्द्रस्थित राशि को लग्न मान कर मातृ सम्बन्धी विविध भावों का, मंगल-स्थित राशि को लग्न मान कर भ्रातृ सम्बन्धी विविध भावों का विचार करना चाहिये। इसी प्रकार बुध आदि ग्रहों से उनसे सम्बन्धित रिश्तेदारों के बारहवों भाव का विचार करे । ॥ २४ ॥