फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता ३०३ तत्तद्भावात्कारकादेवमूह्यं तत्तन्मातृभ्रातृपित्रात्मजाद्यम् । तस्मिन् भावे कारके भावनाथे वीर्योपेते तस्य भावस्य सौख्यम् ॥२५॥ इसलिये पिता, माता, भ्राता, मातुल, पुत्र, स्त्री, भृत्य आदि का विचार करना हो तो उपर्युक्त प्रकार से भाव, भावेश तथा कारक तीनों का विचार करना चाहिये । यदि भाव, भावेश और कारक तीनों बलवान् हों तो उस भाव सम्बन्धी सुख होगा । ॥ २५ ॥ धर्मे सूर्यः शीतगुर्बन्धुभावे शौर्ये भौमः पञ्चमे देवमन्त्री । कामे शुक्रश्चाष्टमे भानुपुत्रः कुर्यात्तस्य क्लेशमित्याहुरन्ये ॥२६॥ नवम में सूर्य, चौथे में चन्द्रमा, तृतीय में मंगल, पंचम में बृहस्पति, सप्तम में शुक्र, और अष्टम में शनि उस भाव सम्बन्धी क्लेश करते हैं ऐसा अन्य लोग कहते हैं । ॥ २६ ॥ लग्नेश्वरो यद्भवनेशयुक्तो यद्भावगस्तस्य फलं ददाति । भावे तदीशे बलभाजि तेन भावेन सौख्यं व्यसनं बलोने ॥२७॥ लग्नेश किस भावेश के साथ रहता है उस भावेश का या जिस भाव में रहता है उस भाव का फल देता है। यदि भाव और उसका स्वामी बलवान् हो तो उस भाव सम्बन्धी सुख होता है । यदि बलहीन हो तो उस भाव सम्बन्धी कष्ट होता है । ॥ २७ ॥