फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 305, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें३०४ फलदीपिका यद्भावप्रभुणा युतो बलवता मुख्याङ्गगो लग्नप- स्तद्भावानुभवं वितनुते यद्भावगस्तस्य च । संयुक्तो बलहीनभावपतिना निन्द्याङ्गभाजां फलं कुर्यात्तद्विपरीतमेवमुदितं सर्वेषु भावेष्वपि ॥२८॥ लग्नेश के अष्टक वर्ग में जिन भावों में शुभ बिन्दु अधिक हों उन भावों के स्वामी यदि बलवान् हों और लग्नेश के साथ हों तो उन भाव सम्बन्धी शुभ फल होगा। किन्तु लग्नेश के अष्टकवर्ग में जिन भावों में थोड़े शुभ बिन्दु हों उन भावों के स्वामी बलहीन हों और लग्नेश से संयुक्त हों तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल नहीं होगा। इसी प्रकार सब भावों का विचार करना चाहिये। बहुतों के मत से बलवान् या निर्बल इतना मात्र देखें। अष्टक वर्ग का विचार इस श्लोक के लिये आवश्यक नहीं है। ॥ २८ ॥ दुःस्थानपस्तदितरस्वगृहस्थितश्चेत् स्वक्षेत्रभावफलमेव करोति नान्यत् । मन्दो मृगे सुतगृहे यदि पुत्रसिद्धिः षष्ठाधिपत्यकृतदोषफलं च नात्र ॥२६॥ यदि कोई ग्रह दो राशियों का स्वामी हो और एक राशि लग्न से शुभ-स्थान में हो और दूसरी राशि लग्न से दुःस्थान में पड़े और यदि ग्रह सुस्थान राशि वाले अपने घर में हों तब वह सुस्थान के स्वामी होने का शुभ फल देता है। दुःस्थान के स्वामी होने का अशुभफल नहीं देता। उदाहरण के लिये यदि कन्या लग्न हो और शनि पंचम में मकर राशि का हो तो यद्यपि वह पंचमेश और षष्ठेश होने से आधा शुभ, आधा पाप होना चाहिये किन्तु मन्त्रेश्वर महाराज के इस श्लोक में बताये गये सिद्धान्त के अनुसार वह पंचम