भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता ३०५ में स्वराशि में स्थित होने के कारण शुभ फल देगा और पुत्र सिद्धि करायेगा । छठे घर के मालिक होने का दोष नहीं होगा । ॥ २९ ॥ राशौ स्थितिर्मिथो योगो दृष्टिः केन्द्रेषु संस्थितिः । त्रिकोणे वा स्थितिः पञ्चप्रकारो बन्ध ईरितः ॥३०॥ इस इलोक में सम्बन्ध या बन्ध किसे कहते हैं यह बताते हैं । सम्बन्ध या बन्ध पाँच प्रकार का होता है । (१) परस्पर स्थान सम्बन्ध, मान लीजिये “क” ग्रह “ख” की राशि में बैठा है और “ख” ग्रह “क” की राशि में । (२) जब दो ग्रह एक ही राशि में हों (३) जब दो ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों (४) जब दो ग्रह केन्द्र में हों (५) जब दो ग्रह त्रिकोण में हों । ॥ ३० ॥