भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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सत्रहवां अध्याय : निर्याणप्रकरण ३२९ उद्यद्द्रैष्काणपतिराशिगते सुरेड्ये तस्य त्रिकोणमपि गच्छति वा विनाशम् । रन्ध्रत्रिभागपतिमन्दिरगेऽथ मन्दे प्राप्ते त्रिकोणमथवास्य वदन्ति मृत्युम् ॥१६॥ यह देखिये कि जन्म लग्न में जो द्रेष्काण है उसका स्वामी कहाँ है । जब बृहस्पति इस द्रेष्काण पति के ऊपर से गुजरे या उससे नवम- पंचम गोचरवश जावे तो जातक को मृत्युभय होता है । यह बृहस्पति के गोचर वश फल बताया गया है । अब इसी श्लोक में शनि के गोचरवश कब मृत्युभय होगा यह बताते हैं: यह देखिये कि अष्टम भाव मध्य पर कौन सा द्रेष्काण है । और यह द्रेष्काण पति कहाँ पर है । जब शनि इस द्रेष्काण-पति की राशियों में से गुजरता है या उससे नवम पंचम जाता है तो जातक को मृत्युभय होता है।* ॥१६॥ विलग्नजन्माष्टमराशिनाथयोः खरत्रिभागेश्वरयोस्तयोरपि । शशाङ्कमान्योरपि दुर्बलांशक- त्रिकोणगे सूर्यसुते मृतिर्भवेत् ॥१७॥

  • मूल श्लोक में शब्द आया है रन्ध्रत्रिभागपति मन्दिरगेऽथ इसके दो अर्थ हो सकते हैं अष्टम भाव में जो द्रेष्काण है उसका स्वामी जिस राशि में है उसमें से जब शनि गुज़रे तो मृत्यु समय या जब उससे नवमपंचम जावे तो जातक को मृत्युभय हो सकता है ।