भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 684 में से

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३३० फलदीपिका यह देखिये कि निम्नलिखित दो-दो में से कौन सबसे अधिक दुर्बल है: (i) लग्न से अष्टम राशि का स्वामी और जन्म-राशि से अष्टम राशि का स्वामी (ii) जन्म लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी और चन्द्रलग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी (iii) चन्द्रमा और (iv) मान्दि। इन मे जो सबसे दुर्बल हो वह जिस नवांश में है उस नवांश से जब शनि गोचरवश या इससे नवम या पंचम जाता है तो जातक को मृत्युभय होता है । ॥१७॥ लग्नाधिपस्थितनवांशकराशितुल्यं रन्ध्राधिपस्य गृहमापतिते घटेशे । तस्मिन्वदेन्मरणयोगमनेकशास्त्र- संक्षुण्णखिन्नमतिभिः परिकीर्तितं तत् ॥१८॥ यह देखिये कि लग्नेश किस नवांश में है। इस नवांश की राशि को कहिये "क"। अष्टमेश किस राशि में है—जिसमें हो उसे कहिये "ख"। मेष से जितनी दूर "क" राशि है, "ख" से उतनी ही दूर राशि पर जब गोचरवश शनि जाता है तब जातक की मृत्यु हो सकती है। ऐसा उन विद्वानों का मत है जिन्होंने अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया है । ॥१८॥ शशाङ्कसंयुक्तदृगाणपूर्वतः खरत्रिभागेशगृहं गतेऽपि वा । त्रिकोणगे वा मरणं शरीरिणां शशिन्यथ स्यात्तनुरन्ध्ररिःफगे ॥१६॥ अब यह बताते हैं कि मृत्यु के समय चन्द्रमा कहाँ होगा । इस श्लोक में यह बताया गया है कि निम्नलिखित किन्हीं स्थानों में चन्द्रमा मृत्यु के समय हो सकता है ।

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