भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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सत्रहवाँ अध्याय : निर्याणप्रकरण ३३१ (i) जन्म कालीन जिस द्रेष्काण में चन्द्रमा हो उसमें जब गोचर वश चन्द्रमा आवे (ii) जन्म में चन्द्रमा जिस स्थान पर है वहाँ से गिनने पर जो बाइसवाँ द्रेष्काण हो उस २२वें द्रेष्काण के स्वामी की राशि। (iii) ऊपर (i) तथा (ii) में जो स्थान बताये गये हैं उनसे नवम या पंचम (iv) लग्न में (v) लग्न से अष्टम या (vi) लग्न से द्वादश ।॥१९॥ निधनेश्वरगतराशौ भानाविन्दौ तु भानुगतराशौ । निधनाधिपसंयुक्ते नक्षत्रे निर्दिशेन्मरणम् ॥२०॥ यदि जन्म लग्न से अष्टम का स्वामी जहाँ बैठा है उस राशि में सूर्य गोचरवश जा रहा हो और चन्द्रमा (क) जिस राशि में जन्म कुण्डली में सूर्य बैठा हो उस राशि में जा रहा हो (ख) या जन्म लग्न से अष्टमेश जन्मकुण्डली में जिस नक्षत्र में हो उस नक्षत्र में चन्द्रमा गोचरवश हो तो जातक की मृत्यु हो सकती है।* ॥२०॥ यो राशिर्गु लिकोपेतः तत्त्रिकोणगते शनौ । मरणं निशिजातानां दिविजानां तदस्तके ॥२१॥

  • जब दशा-अन्तर्दशा मारक ग्रह की हो तब शनि गोचरवश कब मारक होगा और गुरु गोचरवश कब मारक होगा, यह सब निकाल लेने पर सूर्य और चन्द्रमा के अनिष्ट गोचर का विचार करना चाहिये अन्यथा सूर्य तो एक वर्ष में और चन्द्रमा एक मास में सब राशि भ्रमण कर लेता है।