भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 684 में से

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पृष्ठ 355

३५४ फलदीपिका मंगल की महादशा के समय पित्त-प्रकोप, रक्त-प्रकोप, ज्वर, आदि की पीड़ा होती है । वह नीच स्त्री का सेवन करेगा । अपने पुत्र, स्त्री, बन्धु और गुरुओं से विद्वेष होगा और वह दूसरों के भाग्य में लगा हुआ रहेगा। अर्थात् उसके उद्योग से अन्य लोगों का भाग्योदय होगा । ॥ ९ ॥ (iv) जब बुध की महादशा होती है तब मित्रों से समागम होता है । स्वयं को सुख प्राप्त होता है, विद्वान् लोग प्रशंसा करते हैं । यश प्राप्त होता है और गुरुओं की कृपा होती है । मनुष्य की वाणी में प्रगल्भता(अपने आशय को शक्तिपूर्ण शब्दों में व्यक्त करने की क्षमता) होती है । बुध की महादशा में मनुष्य परोपकार करता है और उसको स्वयं की स्त्री, पुत्र, मित्र सम्बन्धी हर्ष तथा महत्व प्राप्त होता है । ॥ १० ॥ (v) बृहस्पति की दशा में मनुष्य धार्मिक कार्य करता है, उसे संतान प्राप्ति या संतान संबंधी हर्ष प्राप्त होता है। राजा उस मनुष्य की प्रतिष्ठा करे अर्थात् उसका सम्मान करे । अन्य विशिष्ट व्यक्ति भी उसकी प्रशंसा करें; हाथी, घोड़े तथा सवारी की प्राप्ति हो । हृदय की आकांक्षाएँ पूर्ण हों । अपनी स्त्री, पुत्र, मित्रों से समागम और सौहार्द हो ॥ ११ ॥ (vi) शुक्र की महादशा में जातक को क्रीड़ा और सुख के साधन, उत्तम सवारी, गौ, रत्न, भूषण, निधि (द्रव्य) स्त्रियों से आनन्द, ज्ञान क्रिया (जिन बातों से ज्ञान वृद्धि हो), जल यात्रा राजा या सरकार से सम्मान प्राप्त हों । शुक्र की महादशा में घर में शुभ कार्य होते हैं । (vii) शनि की महादशा में जातक की स्त्री या पुत्र को रोग हो, स्वयं को भी वात आदि की पीड़ा हो, खेती नष्ट हो-दुष्ट वाणी