भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 684 में से

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पृष्ठ 356

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३५५ बोले ।* खराब स्त्री में आसक्ति हो—अपने परिवार के लोगों से वियोग हो और अकस्मात् स्वजन (अपने इष्टजन) का, भूमि का, सुख का तथा धन का नाश हो। हमारे ख़्याल से शनि की महादशा का यह फल तभी घटित होगा जब शनि जन्मकुण्डली में बहुत बिगड़ा हो ॥ १३ ॥ (vii) राहु की महादशा में राजा से, चोर से, विष से, अग्नि से तथा शस्त्र से भय हो; सन्तान को कष्ट हो, मन में घोर अशान्ति और उद्वेग रहे; बन्धुओं का नाश हो, नीच लोगों से अपमान प्राप्त हो, बदनामी हो। कोई ऐसा दुष्कर्म हो जाये जिसके कारण बदनामी हो; अपना स्थान (मकान या नौकरी) छूट जाये। जो कार्य करे उसमें असफलता और हानि हो तथा अपने पद से गिर जावे** । ॥१४॥ (ख) ऊपर १४वें श्लोक में राहु की महादशा का अशुभ फल बताया गया है। इस श्लोक में कहते हैं कि राहु यदि शुभग्रह के साथ हो और प्रशस्त (उत्तम) भाव में हो तो राहु की महादशा बहुत शुभ फल देने वाली होती है। जातक का वैभव राजा के समान हो। जातक के सब अभीष्ट कार्य सिद्ध हों और वह अपने घर में सुखपूर्वक रहे। उसके पास दृढ़ता से धन संचय हो और पृथ्वी में उसकी कीर्ति प्रसिद्ध हो । ॥१५॥ (ग) यदि कन्या, वृश्चिक या मीन राशि का राहु हो तो राहु की दशा के सम्बन्ध में कुछ विशेष विचार बताते हैं। यदि इन तीनों राशियों में से किसी में राहु हो तो देशाधिपत्य अर्थात् उच्च हुकूमत

  • जब जैसे ग्रह की महादशा होती है तब उसी ग्रह की छाया मनुष्य के शरीर पर रहती है। शुभ ग्रह की महादशा में मनुष्य शुभ वाणी बोलता है। अशुभ ग्रह की दशा में दुष्ट वाणी, अनर्गल, वाहियात, अर्थहीन भाषण करता है ॥ ** मूल संस्कृत श्लोक में शब्द है "पदहति" जिसके दो अर्थ हैं। (१) अपने पद (ओहदे) से गिर जाना (२) पैर में चोट लगना।
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