फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ फलदीपिका प्राप्त हो और बहुत अधिक सुख मिले; पालकी की सवारी मिले। यह सुख वैभव राहु की दशा में प्राप्त हो किन्तु दशा के अन्तिम काल में यह सब नष्ट हो जाये ॥१६॥ (ix) केतु की महादशा में शत्रुओं से, चोरों से, तथा राजा से पीड़ा हो। शस्त्र से आघात का डर हो और उष्णता के रोग हों। जिन रोगों में अधिक गर्मी मालूम होती है—यथा फोड़े, फुंसी, आत- शक, मूर्च्छा आदि को उष्णता के रोग कहते हैं। केतु की महादशा में जातक के कुल को दोष लगे अर्थात् कोई बात ऐसी हो जिससे कुटुम्ब की बदनामी हो। अग्नि का भय हो, स्वयं को झूठा इलज़ाम लगे और अपना देश छोड़ना पड़े। इस प्रकार सूर्य आदि नौ ग्रहों की महादशा का फल बता चुकने पर अब पुनः नौ ग्रहों की दशा का फल बताते हैं। ॥१७॥ अथ तरणिदशायां क्रौर्यभूपालयुद्धै- र्धनमनलचतुष्पात्पीडनं नेत्रतापः । उदरदशनरोगः पुत्रदारार्तिरुच्चै- र्गुरुजनविरहः स्याद्भृत्यनाशोऽर्थहानिः ॥१८॥ शिशिरकरदशायां मन्त्रदेवद्विजोर्वी- पतिजनितविभूतिः स्त्रीधनक्षेत्रसिद्धिः । कुसुमवसनभूषागन्धनानारसाप्ति- र्भवति खलविरोधः स्वक्षयो वातरोगः ॥१९॥ क्षितितनयदशायां क्षेत्रवैरक्षितीश- प्रतिजनितविभूतिः स्यात्पशुक्षेत्रलाभः । सहजतनयवैरं दुर्जनस्त्रीषुसक्ति- र्दहनरुधिरपित्तव्याधिरर्थोपहानिः ॥२०॥