भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 684 में से

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पृष्ठ 364

विशेष बातें हैं जो अन्य ग्रंथों में उपलब्ध नहीं होतीं । यह पाठक स्वयं देखेंगे । इस पुस्तक का नाम भावार्थ रत्नाकर है; रत्नाकर के दो अर्थ हैं--रत्नों का आकर और समुद्र । इसमें फलित ज्योतिष सम्बन्धी अनेक बहुमूल्य रत्न हैं, इस कारण इसका 'रत्नाकर' नाम सार्थक है । क्योंकि रत्नाकर का अर्थ 'समुद्र' भी होता है और समुद्र में तरंगें होती हैं; इस कारण इस ग्रन्थ को अध्यायों में न बांटकर तरंगो में बांटा है; प्रथम तरंग, द्वितीय तरंग आदि । इसमें कुल १४ तरंग हैं । यदि संस्कृत का मूल और उसका हिन्दी में भावार्थ, दोनों दिये जावें तो ग्रन्थ बहुत विस्तृत हो जावेगा, इस कारण यहां केवल भावार्थ ही दिया जा रहा है ।

मेषलग्न विचार

१. यदि किसी व्यक्ति का मेष लग्न हो और चतुर्थेश तथा पंचमेश का सम्बन्ध हो, तो राजयोग होता है । चतुर्थ का स्वामी चन्द्रमा और पंचम का स्वामी सूर्य होने के कारण-सूर्य और चन्द्रमा का सम्बन्ध राजयोग कारक होगा । यदि दोनों एक-दूसरे से सप्तम हों तो पूर्णिमा के आसपास चन्द्रमा होने के कारण विशेष सुन्दर योग होगा क्योंकि अमावस्या के करीब सूर्य चन्द्रमा एक राशि में रहते हैं किन्तु क्षीण चन्द्र होने के कारण चन्द्रमा बलवान् नहीं होता । एक अन्य ज्योतिष ग्रन्थ का मत है कि चाहे कोई भी लग्न हो यदि सूर्य चन्द्रमा दोनों सिंह राशि में हों या दोनों कर्क राशि में हों या सूर्य कर्क में चन्द्रमा सिंह में हो तो मनुष्य का शरीर कृश होता है । पाप दृष्ट तथा अन्य दुर्योग होने से यक्ष्मा भी हो जाता है । २. मेष लग्न की कुंडली में दूसरे और सातवें घर का मालिक शुक्र होने के कारण मारक होता है । किन्तु सदैव यह नहीं समझ लेना चाहिए कि शुक्र मार ही डालेगा । पहले यह निश्चय करना चाहिये कि जातक की आयु अल्प है या मध्य या दीर्घ । जिस आयु में