भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 365

३६४ फलदीपिका मारक की सम्भावना हो उस आयु में शुक्र की महादशा में शनि की अन्तर्दशा या अन्य पापी ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है । जहाँ जहाँ मारक का प्रसंग आवे वहाँ यह अवश्य विचार कर लेना चाहिये कि जातक की आयु अल्प है, मध्य या दीर्घ । ३—मेष लग्न वाले व्यक्ति की कुंडली में बृहस्पति नवें और बारहवें घर का मालिक होता है । यदि ऐसा बृहस्पति दशम स्थान में हो तो मारक हो सकता है । ४—मेष लग्न हो और यदि शनि और बृहस्पति का योग हो तो केवल इस योग मात्र से राजयोग नही होता । यहाँ कहना यह है कि शनि दशमेश होता है और बृहस्पति नवमेश होता है—दोनो के स्वामियों का योग प्रबल राजयोग माना गया है तब शनि और बृहस्पति का योग क्यों नहीं बहुत अच्छा माना गया ? इसका कारण यह है कि शनि दसवें के साथ-साथ ग्यारहवें का भी मालिक होता है और बृहस्पति नवें के साथ-साथ बारहवें का भी मालिक होता है । इस कारण नवमेश दशमेश के योग में एकादशेश द्वादशेश का योग हो जाने से उत्कृष्टता जाती रही । ५—जिस व्यक्ति का मेष लग्न में जन्म होता है उसे माता (शीतला) चेचक, फोड़े, फुन्सी, घाव, चोट, शस्त्र से आघात आदि का भय रहता है । मेष का स्वामी मंगल है इस कारण उपर्युक्त का भय रहता है । ६—यदि मंगल छठे या आठवें घर के मालिक के साथ हो तो उसकी महादशा या अन्तर्दशा में सिर में चोट लगने से या ब्लड प्रेशर (जिस रोग में खून सिर में चढ़ जाता है) या सिर के अन्य रोग से मृत्यु* हो सकती है । *जहां मृत्यु शब्द आवे वहाँ मृत्यु हो जावेगी बिलकुल ऐसा ही नहीं समझना चाहिए । अत्यन्त कष्ट को भी मृत्यु कहते हैं ।