भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 369, कुल 684 में से

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पृष्ठ 369

३६८ फलदीपिका (ख) मेष लग्न हो और सूर्य पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो निश्चय योगप्रद होता है, ऊपर जो बृहस्पति की दृष्टि के दो भिन्न-भिन्न फल बताये गये हैं उसका कारण यह प्रतीत होता है कि बृहस्पति और सूर्य मित्र हैं। इस कारण सूर्य पर बृहस्पति की दृष्टि का अच्छा फल बताया गया है किन्तु शुक्र और बृहस्पति शत्रु हैं इस कारण शुक्र पर बृहस्पति की दृष्टि का उत्तम फल नहीं होता । २०--मेष लग्न हो और सूर्य, बुध, शुक्र तीनों ग्यारहवें घर में बैठे हों तो उनकी दशा भाग्य को बढ़ाने वाली होगी २१—यदि मेष लग्न हो और मेष राशि का सूर्य लग्न मे हो तथा कर्क राशि का चन्द्रमा चौथे घर में हो तो निश्चय राजयोग होता है । २२—यदि किसी व्यक्ति का मेष लग्न हो और सूर्य, बृहस्पति, तथा शुक्र दशम स्थान में हों तो उनकी दशा में गंगास्नान होगा । टिप्पणीः—ऊपर जो मेष लग्न के विशेष योगायोग बताये गये हैं वे प्रायः अन्य ग्रन्थों में प्राप्त नहीं होते । उदाहरण के लिए शुक्र और बृहस्पति की परस्पर दृष्टि पराशर के मत से केन्द्रेश, त्रिकोणेश का सम्बन्ध होने के कारण अच्छी मानी जाती है किन्तु ऊपर १९वें योग में इसका फल अच्छा नहीं बताया गया है । भावार्थ रत्नाकर में विशेष योग हैं। यही इस ग्रन्थ की विशेषता और उपयोगिता है। वृषभलग्न विचार १—यदि वृष लग्न हो तो नवें और दशवें घर के मालिक होने के बावजूद भी शनि योगकारक नहीं होता । न शनि, सूर्य और बुध के योग के बिना राजयोग बनाता है । संस्कृत का श्लोक निम्न- लिखित है । वृषभजातस्यच शनिः भाग्यकर्मेश्वरोऽपिवा । सूर्यसोमसुताभ्याम् वा न युक्तो नैव योगदः ॥१॥

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