भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 684 में से

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सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३६९ एक टीकाकार ने अर्थ किया है कि यदि वृष लग्न हो तो नवें और दसवें घर का स्वामी होने पर भी शनि योग-कारक नहीं होता । और सूर्य और बुध लग्न में होने पर भी राजयोग उत्पन्न नहीं करते । हमारे विचार से द्वितीय पंक्ति का शुद्ध अर्थ यह है कि शनि सूर्य और बुध से युक्त न हो तो योगप्रद नहीं होता । २. यदि वृष लग्न हो, दशम में राहु हो या मकर में नवम में मंगल बृहस्पति हों तो गंगा स्नान की प्राप्ति होती है । ३. यदि वृष लग्न हो, चौथे चन्द्रमा हो और उस चन्द्रमा को बृहस्पति और बुध पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो ऐसा चन्द्रमा योग देता है अर्थात् शुभ फल देता है । वृष लग्न वाले को चन्द्रमा तीसरे घर का स्वामी होगा । साधारण तौर पर तीसरे घर का स्वामी पापी गिना जाता है । इस लग्न में बृहस्पति ८वें और ११वें का मालिक हुआ इस कारण बृहस्पति भी पापी हुआ । साधारण तौर पर पापी को पापी देखे तो विशेष पाप योग होता है परन्तु षड् बल में बुध और बृहस्पति की सदैव शुभ दृष्टि ही मानी गई है । इसी सिद्धान्त पर बृहस्पति दृष्ट चन्द्रमा को शुभ माना है । बुध द्वितीय-पंचमेश होने से यद्यपि वृष लग्न वाले को मारक हुआ किन्तु पंचमेश होने से उसमें शुभता भी आ गई । इस कारण बुध से दृष्ट चतुर्थ स्थित चन्द्रमा को शुभ माना है । चतुर्थ में चन्द्रमा होने से उसे एक रूप केन्द्र बल प्राप्त हुआ और एक रूप दिग्बल भी प्राप्त हुआ । इसी कारण ऐसे चन्द्रमा को शुभ मान लिया है । ४. वृष लग्न हो, सप्तम में वृश्चिक राशि में मंगल हो तो ऐसा मंगल शुभ होता है । ५. यदि मीन राशि में सूर्य, शनि, पड़े हों तो जातक दीर्घायु और भाग्यवान् हो । यहाँ शनि नवम और दशम का स्वामी होने से और सूर्य चतुर्थ का स्वामी होने से चतुर्थेश नवमेश तथा चतुर्थेश दशमेश का

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