फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० फलदीपिका सम्बन्ध हुआ। “लाभे सर्वे प्रशस्ताः” इस सिद्धान्त के अनुसार सूर्य शनि की लाभस्थान में उत्तम स्थिति हुई। ६. यदि वृष लग्न हो और बुध, बृहस्पति किसी भी स्थान में एक साथ बैठें या एक-दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखें तो धन योग होता है। मन्त्रेश्वर महाराज ने अष्टमेश का किसी भी भाव के स्वामी से सम्बन्ध होने से अनिष्ट योग माना है। जातकादेश मार्ग अध्याय १० श्लोक ३४ में भी यह कहा गया है कि अष्टमेश की दृष्टि या किसी भावेश की अष्टम स्थान स्थिति उस ग्रह को बिगाड़ती है। यह स्वा- भाविक शंका होती है कि बृहस्पति आठवें और ग्यारहवें का मालिक होने से बुध को देख कर या उसके साथ बैठकर धन योग कैसे उत्पन्न करेगा ? इसका उत्तर यही है कि बृहस्पति लाभेश है और बुध द्वितीयेश है इस कारण इन दोनों का सम्बन्ध धन योग कारक हुआ। भिन्न-भिन्न भावों में इन दोनों के बैठने से समान फल नहीं होगा। जितना उत्तम फल बुध के कन्या में होने से (दूसरे, पाँचवें का मालिक उच्च राशि में ५वें बैठा हो) और बृहस्पति ११वें घर में मीन राशि का बलवान् हो तो ऐसे बुध और गुरु की परस्पर पूर्ण दृष्टि से जो धन योग हो सकता है अथवा बुध दूसरे घर का मालिक होकर दूसरे में बैठे और बृहस्पति ८वें का मालिक होकर आठवें में बैठे तो जो शुभ फल करेगा, वह—वे दोनों एक-साथ १२वें घर में बैठे हों तो कैसे कर सकते हैं ? इसलिए इस योग में इसका भी तारतम्य कर लेना चाहिए कि दोनों किस राशि में या किन-किन राशियों में बैठे हैं। ७. ऊपर नं० ६ में जो धन योग बताया गया है वह—यदि मंगल, बुध, बृहस्पति से सम्बन्ध करता हो तो नष्ट हो जाता है। अर्थात् बुध या बृहस्पति को या दोनों को मंगल चतुर्थ, सप्तम या अष्टम दृष्टि से देखे या बुध, बृहस्पति के साथ मंगल बैठा हो तो धन योग नहीं होता। यहाँ कारण यह है कि मंगल १२वें घर का स्वामी है। १२वें घर से व्यय या धन के खर्च का विचार होता है। इस कारण व्यय भाव का