फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७२ फलदीपिका किन्तु एक ही ग्रह लग्नेश, षष्ठेश हो तो षष्ठेश होने का दोष नहीं होता । ११. यदि वृष लग्न में मंगल और शुक्र हों और नवम में मकर का बृहस्पति हो तो बुध तथा बृहस्पति की दशा में भाग्य उदय होगा । १२. यदि मंगल, बुध, शनि नवम में हों और दशम में कुंभ का राहु हो तो मंगल तथा राहु की दशा में गंगा स्नान हो । १३. वृष लग्न वाले को शुक्र दशा अच्छी जाती है यह सामान्य नियम है । कारण यह है कि शुक्र पहले और छठे घर का मालिक हुआ । लग्न का स्वामी होने से छठे के स्वामी होने का दोष नहीं होता । पराशर ने भी लिखा है कि मेष लग्न वाले जातक को मंगल अष्टम स्थान का स्वामी होने पर भी शुभ फल करता है और वृष लग्न वाले जातक को शुक्र छठे स्थान का स्वामी होने पर भी शुभ फल करता है । शुक्र की दशा में धनागम होता है । भाग्योदय कारक है । १४. यदि वृष लग्न में चन्द्रमा हो तो जातक को विशेष धन योग नहीं होता । यदि किसी और लग्न में चन्द्रमा प्रथम भाव से हो तो चन्द्रमा भाग्य उदय करता है । मिथुन लग्न १. यदि मिथुन लग्न हो और सूर्य, बुध सिंह राशि में तीसरे घर में बैठे हों तो बुध योग फल देने वाला होता है और उसकी दशा अच्छी जाती है । होरासार अध्याय २३ श्लोक ३ के मतानुसार सूर्य, बुध का योग उत्तम होता है । इस सम्बन्ध में देखिये इस पुस्तक का अध्याय १६ श्लोक ७ जहाँ लग्नेश और तृतीयेश का सम्बन्ध अच्छा बताया गया है ।