भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 374

उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७३ २. मिथुन लग्न वाले जातक की कुण्डली में चन्द्र, मंगल और शुक्र दूसरे घर में बैठे हों तो शुक्र की दशा में धन प्राप्त होता है। ३. यदि मिथुन लग्न हो, कर्क में दूसरे स्थान में मंगल हो और चन्द्रमा और शनि मकर राशि में अष्टम में हों तो शनि की दशा में मिश्रफल (मिला जुला) फल होता है अर्थात् इष्टफल भी और अनिष्ट फल भी। मंगल की दशा में धनागम होता है यह निस्संशय कहा जा सकता है। ४. मिथुन लग्न हो, मंगल और शनि दूसरे हों, चन्द्रमा अष्टम में हो तो शनि और मंगल की दशा में धन नाश होता है, जायदाद नष्ट होती है। किन्तु थोड़ा साधन रह जाता है। ५. मिथुन लग्न वाले जातक को, यद्यपि दूसरे घर का मालिक, होने के कारण चन्द्रमा मारक होना चाहिये किन्तु मारक नहीं होता। ६. मिथुन लग्न हो, चन्द्रमा और मंगल लाभ में हों अर्थात् ग्यारहवें भाव में बैठे हों अथवा नवमेश शनि कुम्भ का नवम में बैठा हो तो विशेष धन योग होता है। ७. मिथुन लग्न हो, गुरु और शनि नवम स्थान में हों तो उनकी दशा और अन्तर्दशा में गंगा स्नान हो। गुरु तो धर्मकारक ग्रह है, इस कारण उसकी दशा और अन्तर्दशा में धार्मिक कार्य होना, गंगास्नान आदि स्वाभाविक ही है। किन्तु शनि भी ऐसा करता है। इसका सिद्धान्त यह है कि मिथुन लग्न की कुण्डली में नवें घर में कुम्भ राशि पड़ेगी और शनि नवम होने से कुम्भ राशि का होगा अर्थात् स्वगृही। ज्योतिष का सिद्धांत है कि यदि पाप ग्रह किसी स्थान पर बैठे तो उस स्थान को बिगाड़ता है लेकिन पापी ग्रह यदि अपनी राशि में बैठे तो उसे—अपने उस भाव को—बिगाड़ता नहीं है बल्कि उस भाव की वृद्धि करता है।