भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 378

उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३७७ ८. सिंह लग्न हो और कर्क के मंगल और शनि बैठे हों तो शनि की दशा में योग होता है । कन्या लग्न अब कन्या लग्न के जातकों के योग बताये जाते हैं :— १. यदि कन्या लग्न हो और सूर्य का शुक्र या चन्द्रमा से सम्बन्ध हो तो सूर्य की दशा में धन प्राप्ति होती है । २. यदि सूर्य शुक्र का सम्बन्ध हो तो शुक्र की दशा में जातक धनहीन हो जाय । सम्भवतः शुक्र धनेश होकर अस्त हो जाने से या धनेश व्ययेश के सम्बन्ध हो जाने से यह कहा है । ३. यदि सूर्य, चन्द्र का सम्बन्ध हो तो चन्द्रमा की दशा मिश्र फल देने वाली होती है अर्थात् मिला-जुला फल; कभी अच्छा, कभी खराब, कुछ अच्छा, कुछ खराब । ४. यदि चन्द्रमा और शुक्र सप्तम में हों, बृहस्पति ११वें हो, सूर्य मेष का हो तो बृहस्पति और शुक्र की दशा में ४ या ५ जीवित पत्नियां हों । ऐसा व्यक्ति राजा के तुल्य ऐश्वर्य-युक्त और भोगी होता है । प्राचीन समय में जब अनेक पत्नियां होना सुख और भोग का लक्षण माना गया था यह योग लिखा गया था परन्तु अब जिन देशों या जातियों में कानून द्वारा बहु-विवाह प्रथा बन्द हो गई है यह योग घटित नहीं होगा । परन्तु सप्तम में शुक्र और चन्द्रमा के मीन राशि में होने से (शुक्र मीन में उच्च का होता है) और सप्तमेश बृहस्पति के कर्क (लाभ स्थान) में—अपनी उच्च राशि में बैठ कर सप्तम को पूर्ण दृष्टि से देखने के कारण ऐसी कुण्डली वाले पुरुष को बहुत सौन्दर्ययुक्त शुभ लक्षणा पत्नी प्राप्त होगी और वह उच्च कुल की भी होगी (क्योंकि सप्तमेश उच्च राशि का हुआ) और उसको विवाह के द्वारा एवं विवाह के बाद अच्छा लाभ