भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 377

३७६ फलदीपिका बहुत धन कारक योग कहा है। सूर्य, मंगल का योग लग्नेश, चतुर्थेश, भाग्येश का योग हुआ। २. यदि सूर्य, बुध, वृहस्पति साथ हों तो भी बहुत धन कारक होता है। सूर्य, बुध का योग तो धन कारक योग हुआ ही (जिसका हेतु ऊपर बताया जा चुका है) वृहस्पति पंचमेश होने से लग्नेश, द्वितीयेश, पंचमेश, लाभेश का योग हो गया। यह योग धन कारक होना ही चाहिए। ३. यदि केवल सूर्य-बुध एक साथ हों तो स्वल्प (थोड़ा) भाग्य करते हैं। ४. यदि वृहस्पति और शुक्र एक साथ हों तो योग उत्पन्न नहीं करते बल्कि योग भंग करते हैं ऐसा ज्योतिषियों का मत है। ५. यदि सिंह लग्न हो और तुला का शुक्र तृतीय स्थान में हो तो शुक्र शुभ होता है किन्तु यदि शुक्र दशम में हो तो ऐसा शुक्र पापी होगा और जातक को योग प्राप्त नहीं होता। ऐसा भावार्थ रत्नाकर ग्रंथकार ने क्यों लिखा यह समझ में नहीं आता क्योंकि अपने घर में बैठा हुआ ग्रह तो घर को बिगाड़ता नहीं। यह अवश्य है कि केन्द्र का स्वामी शुभ ग्रह शुभ फल नहीं करता और केन्द्र का स्वामी क्रूर ग्रह शुभ फल करता है परन्तु चाहे शुभ, चाहे क्रूर ग्रह केन्द्र में यदि अपनी राशि का बैठा हो तो उसे अपने भाव की वृद्धि ही करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त अपने घर का शुक्र दशम में मालव्य योग उत्पन्न करेगा जो बहुत उत्तम योग है। इस कारण भावार्था रत्नाकर के इस मत से हम पूर्ण सहमत नहीं हैं। हमारे विचार में ऐसी स्थिति में शुक्र के बल, सम्बन्ध, और उस पर अन्य ग्रहों की दृष्टि आदि का विचार कर लेना चाहिये। ६. यदि सिंह लग्न हो तो केवल नवमेश और दशमेश अर्थात् मंगल और शुक्र के सम्बन्ध से कोई योग नहीं होता। ७. यदि सिंह लग्न हो, सूर्य, मंगल और बुध लग्न में हों तो बुध की दशा के समय धन और भाग्य की वृद्धि होती है।