फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९१ (ix) यदि नवमेश बलवान् हो तो जातक अपनी स्त्री, पुत्र, पौत्र और भाई बन्धुओं के साथ निरन्तर भाग्य और लक्ष्मी का अनु- भव करता है अर्थात् अपने कुटुम्बी जनों के साथ ऐश्वर्य भोगता है। बलवान् भाग्येश की दशा में जातक देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति करे, राजा द्वारा प्रशंसित और सम्मानित हो और श्रेष्ठ कर्मों के करने में लगा रहे । नवम भाव से धन और भाग्य का विचार किया जाता है । इस कारण बलवान् भाग्येश की दशा में भाग्य-वृद्धि भी होती है और धन-वृद्धि भी ॥ १० ॥ (x) यदि दशम भाव और दशमेश बलवान् हों तो दशमेश की दशा में जिसकार्य को भी मनुष्य आरम्भ करता है उसी में सफलता मिलती है और जातक का जीवन सुखमय व्यतीत होता है । जातक की मान वृद्धि होती है, उसे यश प्राप्त होता है । वह उत्तम कार्यों में लगा रहता है और उसे प्रतिष्ठा मिलती है ॥ ११ ॥ , (ix) बलवान् लाभाधिपति की दशा में निरन्तर ऐश्वर्य की वृद्धि हो । प्रिय बन्धुओं से समागम हो और नौकरों की संख्या भी बढ़े । सांसारिक सौभाग्य में बहुत वृद्धि हो ॥ १२ ॥ (xii) बलवान् व्ययेश की महादशा में जातक सज्जनों पर बहुत अधिक व्यय करे । अर्थात् बलवान् व्ययेश के होने से उसकी महादशा में व्यय तो होता है किन्तु शुभ कार्यों में खर्च होता है, अशुभ कार्यों में नहीं । राजा से सम्मान प्राप्त होता है और मनुष्य ऐसे शुभ कर्म करता है जिनसे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥ वक्रगस्य निजतुङ्गसुहृत्- सुस्थानगस्य दशाफलमेवम् । शत्रु नीचगृहमौढ्यषडन्त्य- छिद्रगस्य तु फलान्यपि वक्ष्ये ॥१४॥