भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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३९० फलदीपिका

का मन्त्रित्व प्राप्त हो और जातक को बहुत मान मिले । जातक उत्तम कार्य करे जिसकी सज्जन लोग प्रशंसा करें । वह नाना प्रकार के सुस्वादु भोजन ख़ुद करे तथा औरों को खिलावे ॥ ६ ॥ (vi) यदि षष्ठेश बलवान् हो तो उसकी महादशा में जातक अपने साहस से शत्रुओं का पराजय करे । वह भी निरोगी रहे । उदार हो और अति शक्तिशाली होता हुआ लक्ष्मी का भोग करे । अर्थात् उसको कोई दबा न सके और वह ऐश्वर्य भोगे* ॥ ७ ॥ (vii) यदि सप्तमेश बलवान् हो तो जातक नवीन वस्त्र और आभूषण प्राप्तकर स्त्री के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करे । उसके शरीर में बल की वृद्धि रहे । उसके घर में विवाह आदि शुभ कार्य हों और ऐसी यात्रा करे जिससे सन्तोष हो । अर्थात् जिस उद्देश्य से यात्रा की जाय वह सफल हो । सप्तम स्थान से स्त्री सुख और यात्रा का विचार किया जाता है । इस कारण बलवान् सप्तमेश की महा- दशा में सप्तम भाव सम्बन्धी पूर्ण सुख की प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥ (viii) यदि अष्टमेश बलवान् हो तो अष्टमेश की दशा में जातक अपना ऋण चुका दे । जातक की उन्नति हो । यदि जातक का किसी से कलह रहा हो तो उस कलह का अन्त हो जावे । और भैंस, पशु, बकरी तथा नौकरों की प्राप्ति अथवा वृद्धि हो** ॥ ९ ॥


*जो केवल लघु पाराशरी पढ़ते हैं वह समझते हैं कि षष्ठेश की महादशा सदैव ही खराब होती है ऐसा समझना ग़लत है । बलवान् ग्रह सदैव अपने भाव सम्बन्धी शुभ फल ही दिखाता है । **प्रायः अष्टमेश की दशा को घोर कष्टमय और संकटपूर्ण समझा जाता है किन्तु मन्त्रेश्वर महाराज के विचार से यदि अष्टमेश बलवान् हो तो उसकी दशा में कष्ट से निवृत्ति और सुख के साधनों की उपलब्धि होती है ।