भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 684 में से

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बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३८९ हैं। द्वितीयेश की दशा में कुटुम्ब वृद्धि हो; उत्तम बेटियाँ* प्राप्त हों । सुख पूर्वक भोजन मिले; वाणी या वाक् शक्ति के कारण धन उपार्जन करे । अर्थात् ऐसी आजीविका से धन प्राप्त हो जिसमें जातक की वाक्शक्ति की प्रधानता हो और जातक जो उत्तम वाणी बोले उसकी सब लोग सभा में प्रशंसा करें। संक्षेप में यह कि द्वितीय स्थान वाणी, धन और कुटुम्ब का है अतः इन तीनों बात सम्बन्धी सफलता मिले ॥ ३ ॥ (iii) यदि तृतीय स्थान बलवान् हो तो तृतीयेश की दशा में भाई-बहिनों से प्रेम रहता है खुश-खबरियाँ सुनने को मिलती हैं, परा- क्रम की वृद्धि होती है, जातक किसी सेना या समुदाय का नेता होता है, अन्य लोग उसे सहायता देते हैं । उसमें अनेक गुणों का विकास होता है तथा जातक के मान सम्मान और अभिमान की वृद्धि होती, है ॥ ४ ॥ (iv) यदि चतुर्थ स्थान और उसका स्वामी बलवान् हो तो चतुर्थेश की दशा में जातक बन्धुओं का उपकार करतां है, खेती के काम में सफलता होती है, स्त्री के साथ सुखपूर्वक सहवास होता है और सवारी का लाभ भी होता है। खेत, मकान, धन, सिद्धि और प्रशस्त स्थान की प्राप्ति होती है। अर्थात् उसकी पदवृद्धि हो या नवीन मकान अथवा ज़मीन की प्राप्ति हो ॥ ५ ॥ (v) यदि पंचमेश बलवान् हो तो उसकी महादशा में पुत्र की प्राप्ति हो, बन्धुओं के साथ हँसी-खुशी जीवन व्यतीत हो, राजाओं *मूल श्लोक में शब्द आया है “सत्पुत्रिकाप्तिम्” किंतु द्वितीय स्थान से पुत्री का विचार कहीं नहीं लिखा है । कुटुम्ब का विचार होता है। संभवतः सत्पुत्रिकाप्तिम् की बजाय मूल में “सत्पत्रिकाप्तिं” उत्तम शुभ चिट्ठियां प्राप्त हों यह पाठ होना चाहिये । आगे श्लोक १५ में जहाँ द्वितीयेश का विचार किया गया है—“पत्रिका” का विचार द्वितीय स्थान से किया गया है—पुत्रिका का नहीं ।

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