फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 389, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें३८८ फलदीपिका श्रेयांसि कार्याण्यवनीशपूजां भाग्येशदाये द्विजदेवभक्तिम् ॥१०॥ यत्कार्यमारब्धमुपैत्यनेन तस्यैव सिद्धिं सुखजीवनं च । कीर्ति प्रतिष्ठां कुशलप्रवृत्तिं मानोन्नतिं कर्मपतेर्दशायाम् ॥११॥ ऐश्वर्यमव्याहतमिष्टबन्धु- समागमं भृत्यजनांश्च दासान् । संसारसौभाग्यमहोदयं च लभेत लाभाधिपतेर्दशायाम् ॥१२॥ व्ययेशितुर्वयस्यतिव्ययं करोति सज्जने । अघौघनाशिनीं शुभक्रियां महीशमान्यताम् ॥१३॥ (i) यदि लग्न बलवान् हो तो लग्नेश की दशा में जातक का प्रभुत्व जगत् में बढ़ता है, वह सुख पूर्वक रहता है; शरीर बलवान् रहता है (अर्थात् लग्नेश की दशा के समय रोग आदि नहीं होते) और चेहरे पर कान्ति रहती है। चेहरे पर कान्ति होना यह प्रकट करता है कि मन और शरीर दोनों प्रसन्न हैं। जिस प्रकार शुक्ल पक्ष की द्वितीया का चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धि और अभ्युदय को प्राप्त होता है उसी प्रकार बलवान् लग्नेश की दशा में जातक की निरन्तर उन्नति होती रहती है ॥ २ ॥ (ii) यदि द्वितीयेश बलवान् हो तो क्या फल होता है यह बताते