फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
३९० फलदीपिका
का मन्त्रित्व प्राप्त हो और जातक को बहुत मान मिले । जातक उत्तम कार्य करे जिसकी सज्जन लोग प्रशंसा करें । वह नाना प्रकार के सुस्वादु भोजन ख़ुद करे तथा औरों को खिलावे ॥ ६ ॥ (vi) यदि षष्ठेश बलवान् हो तो उसकी महादशा में जातक अपने साहस से शत्रुओं का पराजय करे । वह भी निरोगी रहे । उदार हो और अति शक्तिशाली होता हुआ लक्ष्मी का भोग करे । अर्थात् उसको कोई दबा न सके और वह ऐश्वर्य भोगे* ॥ ७ ॥ (vii) यदि सप्तमेश बलवान् हो तो जातक नवीन वस्त्र और आभूषण प्राप्तकर स्त्री के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करे । उसके शरीर में बल की वृद्धि रहे । उसके घर में विवाह आदि शुभ कार्य हों और ऐसी यात्रा करे जिससे सन्तोष हो । अर्थात् जिस उद्देश्य से यात्रा की जाय वह सफल हो । सप्तम स्थान से स्त्री सुख और यात्रा का विचार किया जाता है । इस कारण बलवान् सप्तमेश की महा- दशा में सप्तम भाव सम्बन्धी पूर्ण सुख की प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥ (viii) यदि अष्टमेश बलवान् हो तो अष्टमेश की दशा में जातक अपना ऋण चुका दे । जातक की उन्नति हो । यदि जातक का किसी से कलह रहा हो तो उस कलह का अन्त हो जावे । और भैंस, पशु, बकरी तथा नौकरों की प्राप्ति अथवा वृद्धि हो** ॥ ९ ॥
*जो केवल लघु पाराशरी पढ़ते हैं वह समझते हैं कि षष्ठेश की महादशा सदैव ही खराब होती है ऐसा समझना ग़लत है । बलवान् ग्रह सदैव अपने भाव सम्बन्धी शुभ फल ही दिखाता है । **प्रायः अष्टमेश की दशा को घोर कष्टमय और संकटपूर्ण समझा जाता है किन्तु मन्त्रेश्वर महाराज के विचार से यदि अष्टमेश बलवान् हो तो उसकी दशा में कष्ट से निवृत्ति और सुख के साधनों की उपलब्धि होती है ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९१ (ix) यदि नवमेश बलवान् हो तो जातक अपनी स्त्री, पुत्र, पौत्र और भाई बन्धुओं के साथ निरन्तर भाग्य और लक्ष्मी का अनु- भव करता है अर्थात् अपने कुटुम्बी जनों के साथ ऐश्वर्य भोगता है। बलवान् भाग्येश की दशा में जातक देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति करे, राजा द्वारा प्रशंसित और सम्मानित हो और श्रेष्ठ कर्मों के करने में लगा रहे । नवम भाव से धन और भाग्य का विचार किया जाता है । इस कारण बलवान् भाग्येश की दशा में भाग्य-वृद्धि भी होती है और धन-वृद्धि भी ॥ १० ॥ (x) यदि दशम भाव और दशमेश बलवान् हों तो दशमेश की दशा में जिसकार्य को भी मनुष्य आरम्भ करता है उसी में सफलता मिलती है और जातक का जीवन सुखमय व्यतीत होता है । जातक की मान वृद्धि होती है, उसे यश प्राप्त होता है । वह उत्तम कार्यों में लगा रहता है और उसे प्रतिष्ठा मिलती है ॥ ११ ॥ , (ix) बलवान् लाभाधिपति की दशा में निरन्तर ऐश्वर्य की वृद्धि हो । प्रिय बन्धुओं से समागम हो और नौकरों की संख्या भी बढ़े । सांसारिक सौभाग्य में बहुत वृद्धि हो ॥ १२ ॥ (xii) बलवान् व्ययेश की महादशा में जातक सज्जनों पर बहुत अधिक व्यय करे । अर्थात् बलवान् व्ययेश के होने से उसकी महादशा में व्यय तो होता है किन्तु शुभ कार्यों में खर्च होता है, अशुभ कार्यों में नहीं । राजा से सम्मान प्राप्त होता है और मनुष्य ऐसे शुभ कर्म करता है जिनसे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥ वक्रगस्य निजतुङ्गसुहृत्- सुस्थानगस्य दशाफलमेवम् । शत्रु नीचगृहमौढ्यषडन्त्य- छिद्रगस्य तु फलान्यपि वक्ष्ये ॥१४॥
- तिं The 'न्' in 'बहून्दुष्कृतिं' has a small curve to the left, exactly like the letter in question! Wait, but if it is 'न्', then 'न्' + 'र्थ' would be 'न्' followed by 'र्थ': "न्अर्थतां" or "न्थरतां"? Wait, why would there be 'म' before it? "चोराद्भीतिमन्अर्थतां"? Wait! Let's look at "अ" in Devanagari in this book: Look at 'अ' in: व्याध्याधीनपरक्रियाभिगमनं स्थानच्युतिं चापदम् वीर्योने प्रतिभापतौ मन्तःशत्रु और कोई Where is an 'अ'? "अ" in "बताये"? No. "अनिष्ट": look at 'अ' in 'अनिष्ट' : Top horizontal, left 3-shape, middle horizontal, right vertical. Now look at character 6 in : Does it look like 'अ'? No, it doesn't have the 3-shape. Does it look like 'म'? Wait, compare it to 'म' in 'मन्तःशत्रु' or 'दमनं': In 'दमनं': द - म - नं 'म' has a left vertical, loop, horizontal,
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९३ रन्ध्रेशायुषि शोकमोहमदमात्सर्यादिमूर्च्छोच्छ्रितिं दारिद्र्यं भ्रमणं वदेदपयशोव्याधीन्र्वजां मृतिम् ॥१८॥ पूर्वोपासितदेवकोपमशुभं जायातनूजापदं दौष्कृत्यं स्वगुरोः पितुश्च निधनं दैन्यं शुभे दुर्बले । यद्यत्कर्म करोति तत्तदफलं स्यान्मानभङ्गो नभो- भावे दुर्गुणतां प्रवासमशुभं दुर्वृत्तिमापन्नताम् ॥१९॥ श्रवणमशुभवाचां भ्रातृकष्टं सुतार्ति भवपवयसि दैन्यं वञ्चनं कर्णरोगम् । बहुरुजमपमानं बन्धनं सर्वसम्पत्- क्षयमपरशशीवाऽऽयाति रिःफेशदाये ॥२०॥ (1) यदि लग्नेश ऊपर लिखे हुये चार दोषों में से एक या अधिक दोषों से युक्त हो तो उसकी महादशा में जातक को जेल जाने का भय या अज्ञातवास का भय होता है अर्थात् उसे बंधन में रहना पड़े या ऐसी दुःस्थिति आ जावे कि छिप कर रहना पड़े; उसे निरन्तर भय रहे और आधि-व्याधि से युक्त हो । व्याधि शारीरिक रोग को कहते हैं । आधि मानसिक रोग या दुश्चिन्ताओं का नाम है । निर्बल या दुःस्थान स्थित हुए लग्नेश की दशा में जातक को मृत्यु संस्कार आदि अशुभ कार्यों में सम्मिलित होना पड़ता है । अपने ओहदे या मकान से हटना पड़ता है और निरन्तर आपत्ति ग्रस्त रहता है । (ii) यदि द्वितीयेश बिगड़ा हुआ हो तो उसकी महादशा में यदि सभा में बोलने का अवसर हो तो जड़ता हो जाये अर्थात् बोल न सके । अपनी वाणी पर कायम न रहे। उसका कुटुम्ब इधर-उधर बिखर जावे । नेत्र रोग हो । वाणी में दोष हो (मुख में शारीरिक *मूलश्लोक में केवल यह कहा है कि लग्नेश यदि दुःस्थान में हो । परन्तु ऊपर श्लोक १४ में चार दोष गिनाये गये हैं ।
३९४ फलदीपिका विकार हो या दुष्ट वाणी बोले)। द्रव्य का व्यय हो, राजा से भय हो और अशुभ पत्रों की प्राप्ति हो। श्लोक तीन में द्वितीय स्थान का विचार करते समय उन सब वस्तुओं का विचार कर लेना चाहिए जो दूसरे घर से देखते हैं। ॥ १५ ॥ (iii) यदि तीसरे घर का स्वामी बिगड़ा हुआ हो तो सहोदर भाई-बहिन की मृत्यु की आशंका हो। जातक के कार्य की अनिष्ट आलोचना हो और छिपे हुए शत्रुओं से पीड़ा हो, जातक की हार हो, उसको नीचा देखना पड़े और उसका गर्व भंग हो। बिगड़े हुए तृतीयेश की महादशा में उपर्युक्त अनिष्ट फल होते हैं। (iv) यदि चौथे घर का स्वामी निर्बल हो तो उसकी महादशा में माता को कष्ट हो, इष्टजनों और मित्रों को कष्ट हो, खेत और मकान के नष्ट होने का भय हो। पशु-अश्व आदि नष्ट हों और जल का भय हो। चौथे स्थान से जल का भी विचार किया जाता है। इस कारण चतुर्थेश के बिगड़ने से जल का भय लिखा है। ॥ १६ ॥ (v) यदि पंचमेश निर्बल हो तो उसकी महादशा में जातक के पुत्र की मृत्यु हो, बुद्धि में भ्रम हो, ठगा जावे, निरर्थक इधर-उधर भ्रमण करना पड़े—रास्ता चलना पड़े—पेट की बीमारी हो, राजा का कोप हो और जातक की शक्ति का निरर्थक अपव्यय हो। (vi) यदि षष्ठेश बिगड़ा हुआ हो तो चोरों से डर हो, अनर्थता हो (दरिद्रता या कष्टमय घटनायें)। जातक का अन्य लोगों द्वारा दमन हो, रोग हो। जातक से दुष्कर्म बन पड़े या जातक के साथ लोग बुरा व्यवहार करें। जातक को किसी की नौकरी करनी पड़े, अपमान और अपयश प्राप्त हो और उसके शरीर में व्रण (घाव) हो ॥ १७ ॥ (vii) यदि सप्तमेश निर्बल हो तो उसकी महादशा में जामाता को कष्ट हो। जातक का अपनी स्त्री से विरह हो और स्त्री के कारण बहुत कष्ट उठाना पड़े। निर्बल सप्तमेश की महादशा में असत्या में रुचि हो, गुप्त रोग हों और निरर्थक भ्रमण करता रहे।
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९५ (viii) यदि अष्टमेश बिगड़ा हुआ हो तो उसकी महादशा में दरिद्रता, कष्ट, भय, भ्रमण, अपयश, व्याधि, अपमान आदि होते हैं— मृत्यु भी हो सकती है। बिगड़े हुये अष्टमेश की महादशा में शोक, मोह, मद, मात्सर्य आदि तथा मूर्च्छा के कारण बहुत अधिक मानसिक सन्ताप रहता है। ॥ १८ ॥ (ix) यदि नवमेश दुर्बल हो तो उसकी महादशा में जातक की स्त्री और पुत्र पर आपत्ति आती है। उसको दीनता आ घेरती है। पिता की मृत्यु हो जाती है। उससे दुष्कर्म बन पड़ते हैं। किसी गुरुजन की मृत्यु हो। नवम स्थान धर्म स्थान है इन कारण दुर्बल नवमेश की दशा में आपत्ति, विपत्ति, कष्ट आवें तो समझना चाहिये कि पहले जिस किसी देवता की उपासना की गई है उसमें कोई अपराध बन जाने के कारण यह सब अशुभ फल हो रहे हैं। (x) अब दुर्बल दशमेश की महादशा का फल बताते हैं। दशम कर्म स्थान है। इसका स्वामी निर्बल हो तो उसकी दशा में जो जो भी कर्म मनुष्य करता है वह सभी निष्फल होते हैं, जातक से निन्दित कार्य बन पड़े। घर से बाहर रहना पड़े इस कारण कष्ट हो। और अशुभ घटनायें हों। संक्षेप में यह है कि जातक का जीवन कष्टमय, मानहीन, निष्फल रहे। ॥ १९ ॥ (ix) यदि एकादशेश निर्बल और बिगड़ा हुआ हो तो भाई को कष्ट हो, पुत्र को बीमारी हो, जातक ठगा जाये, उसे कर्ण-रोग हो और उसमें शारीरक, मानसिक तथा आर्थिक दीनता आ जावे। इस महादशा या अन्तर्दशा में अशुभ समाचार भी सुनने को मिलते हैं। यहां इस ओर ध्यान आकर्षित कराया जाता है कि तृतीय से छोटे भाई का विचार किया जाता है, एकादश से बड़े भाई का। तृतीय से दाहिने कान का, एकादश से बाँये कान का। (xii) यदि बारहवें घर का मालिक दुर्बल हो तो जातक को
३१६ फलदीपिका अनेक बीमारियाँ हों, अपमान हो और बंधन को प्राप्त हो और कृष्णपक्ष के चन्द्रमा की तरह उसकी सारी सम्पत्ति का क्रमशः क्षय हो जावे। कोई भावेश यदि बलवान् हो तो उसकी दशा का शुभ फल बताया गया है। कोई भावेश यदि दुर्बल हो तो उसका अशुभ फल बताया है। इस कारण फल कहते समय केवल यही नहीं देखना चाहिये कि जिस ग्रह की महादशा है वह किस भवन का स्वामी है बल्कि यह भी देखना चाहिये कि वह बलवान् है या नहीं। संज्ञायां यदगाच्च कारकविधिश्व्लोकेषु यज्जल्पितं कर्माजीवनिरूपितं फलमिदं यद्रोगचिन्ताविधौ । यद्यस्येक्षणयोगसंभवफलं भावेशयोगोद्भवं भावेशैरपि भावगैरपि फलं वाच्यं दशायामिह ॥२१॥ ग्रहों की संज्ञा बताते समय जो कुछ प्रथम अध्याय में बताया गया है; कौन सा ग्रह किन किन वस्तुओं का कारक है इस सम्बन्ध में दूसरे अध्याय में जो कुछ बताया गया है; कौन सा ग्रह क्या कर्म कराता है और किस मार्ग से आजीविका दिलाता है इस सम्बन्ध में पंचम अध्याय में जो कुछ भी कहा गया है, और किस ग्रह से क्या रोग और किस प्रकार की चिन्ता होती है इस सम्बन्ध में जो चौदहवें अध्याय में वर्णन किया गया है; ग्रहों के, परस्पर दृष्टि और योग से जो फल होते हैं या किन्हीं दो भावेशों के मिलने से जो योग होता है तथा किसी भाव का स्वामी होने से तथा किसी भाव में बैठने से जो फल होता है, इस सब का विचार करके उस ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा का फल कहना चाहिये। यह सब विषय पन्द्रहवें अध्याय से बीसवें अध्याय तक बताये गये हैं। ॥ २१ ॥
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९७ वर्गोत्तमांशस्थदशा शुभप्रदा मिश्रेव सा चास्तमिते च नीचगे । मृत्युव्ययारीशदशापहारयो- स्तत्र स्थितस्याप्यशुभं फलं भवेत् ॥२२॥ यदि कोई ग्रह वर्गोत्तम में हो तो वह बहुत शुभ फल देता है। किन्तु यदि वर्गोत्तम में होते हुए भी वह ग्रह अपनी नीच राशि में हो या अस्त हो तो अच्छा-बुरा—मिला-जुला फल होता है । ६, ८, १२ इन घरों के मालिकों में से किसी एक की महादशा और किसी अन्य की अन्तर्दशा हो तो अशुभ फल होता है । इसी प्रकार ६, ८ या १२ इन स्थानों में से किसी एक स्थान में बैठे हुये ग्रह की महादशा हो और त्रिक* में बैठे हुये ही किसी अन्य ग्रह की अन्तर्दशा हो तो वह भी अशुभ होती है । २२ ॥ क्रूरग्रहस्यैव दशापहारे त्रिपञ्चसप्तर्क्षपतेर्विपाके । तथैव जन्माष्टमनाथभुक्तौ चोरारिपीड़ां लभतेऽतिदुःखम् ॥२३॥ यदि किसी क्रूर ग्रह की महादशा हो और उसमें किसी ऐसे ग्रह की अन्तर्दशा हो जो जन्म नक्षत्र से तीसरे, पाँचवे या साँतवे नक्षत्र का मालिक हो तो ऐसी परिस्थिति में जातक के घर में चोरी होती है, उसे शत्रु पीड़ा होती है और वह अति दुःखित रहता है । किस नक्षत्र का कौन सा स्वामी है यह पहिले बताया गया है । मान लीजिये किसी व्यक्ति का रेवती नक्षत्र में जन्म है तो रेवती, अश्विनी, *छठे, आठवें, बारहवें घर को त्रिक कहते हैं ।
३९८ फलदीपिका भरणी—भरणी तृतीय नक्षत्र हुआ; रोहिणी पंचम नक्षत्र हुआ; आर्द्रा सप्तम नक्षत्र हुआ । भरणी का स्वामी शुक्र है, रोहिणी का चन्द्रमा, आर्द्रा का राहु । ऐसी स्थिति में किसी क्रूर ग्रह की दशा हो— मान लीजिये शनि की महादशा हो तो उसमें शुक्र, चन्द्र और राहु की अन्तर्दशा कष्टमय जावेगी । इसी प्रकार क्रूर ग्रह की दशा हो और उसमें जन्मराशि के स्वामी की अन्तर्दशा हो या जन्म राशि से अष्टम राशि के स्वामी की दशा हो तो चोर-पीड़ा, शत्रु-पीड़ा और दुःख आदि कष्ट होते हैं ॥ २३ ॥ शनेश्चतुर्थी च गुरोस्तु षष्ठी दशा कुजाह्वोर्यदि पञ्चमी सा । कष्टा भवेद्राश्यवसानभाग- स्थितस्य दुःस्थानपतेस्तथैव ॥२४॥ निम्नलिखित दशायें कष्टकारक होती हैं । (१) शनि की दशा यदि चौथी हो । (२) बृहस्पति की दशा यदि छठी हो (३) मंगल और राहु की दशा यदि पाँचवी हों । (४) किसी राशि के अन्तिम अंश पर स्थित यदि कोई ग्रह हो अर्थात् यदि कोई ग्रह किसी भी राशि में ३०वें अंश पर हो । (५) दुःस्थान अर्थात् ६, ८, १२ के मालिक की दशा। यदि किसी का जन्म मंगल की महादशा में हो तो भौ. रा. जी. श—शनि की दशा उसे चौथी होगी । यदि किसी का जन्म शुक्र की महादशा में हो तो राहु की दशा पंचम होगी और गुरु की दशा षष्ठ होगी । इसी प्रकार यदि किसी का जन्म केतुकी महादशा में हो तो मंगल की दशा उसे पंचम होगी ॥ २४ ॥
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९९ ऊर्ध्वास्यतुङ्गभवनस्थितभूमिजस्य कर्मायगस्य हि दशा विदधाति राज्यम् । जित्वा रिपून्विपुलवाहनसैन्ययुक्तां राज्यश्रियं वितनुतेऽधिकमन्नदानम् ॥२५॥ यदि मंगल ऊर्ध्वमुख राशि में स्थित होकर मकर में हो और लग्न से दशम या एकादश स्थान में स्थित हो तो राज्य प्रदान करती है। ऐसा जातक शत्रुओं को जीत कर बहुत बड़ी सेना का अधिपति हो राज्यलक्ष्मी का उपभोग करता है और उसके आश्रय में अनेक लोग पेट पालते हैं । यह जो विशिष्ट राजयोग बताया गया है इसमें तीनो बात होना आवश्यक है; (१) मंगल उच्च राशि में हो (२) दशम या एकादश में हो (३) ऊर्ध्वमुख राशि में हो । ऊर्ध्वमुख राशि किसे कहते हैं यह पहले अध्याय के आठवें श्लोक में बताया गया है ।* ॥ २५ ॥ स्वोच्चस्थितो भृगुसुतो व्ययकर्मगो वा लाभेऽपि वाऽस्तरहितो न च पापयुक्तः । तस्याब्दपाकसमये बहुरत्नपूर्णो धीमान्विशालविभवो जयति प्रशस्तः ॥२६॥ अब शुक्र सम्बन्धी एक विशिष्ट राजयोग बताते हैं। यदि मीन, तुला या वृषभ राशि का शुक्र दशम या द्वादश में स्थित हो या एकादश में ही हो किन्तु किसी पाप ग्रह के साथ न हो और अस्त न हो तो उस शुक्र की महादशा में जातक बहुत धनी, वैभव युक्त, *यह मंगल की महादशा का फल है ।
४०० फलदीपिका स्वर्ण आदि से सम्पन्न, लोक में प्रशंसित होकर भोग करता है । यह शुक्र महादशा का फल है । * अब ऐसे ग्रहों की महादशा का फल बताते हैं जो नीच राशि में छठे या आठवें हों । प्रायः यह समझा जाता है कि शुभ-ग्रह कहीं भी बैठे अच्छा । तो क्या छठे या बारहवें में बैठा हुआ शुभ ग्रह शुभ फल दिखावेगा ? एक ज्योतिष की कहावत है कि : “पापाः षष्ठे वित्तलाभं प्रकुर्युः” तो क्या पाप-ग्रह छठे में अच्छा फल दिखावेंगे ? इन्हीं शंकाओं का जवाब नीचे के श्लोक में दिया जा रहा है । नीचारिषष्ठव्ययसंश्रिता हि शुभाः प्रयच्छन्त्यशुभानि सर्वे । शुभेतरास्त्वेषु गताः प्रयच्छ- न्त्यमोघदुःखानि दशासु तेषाम् ॥२७॥ यदि शुभ-ग्रह नीच-राशि में, शत्रु-राशि में, छठे या बारहवें बैठे हों तो यह सब अशुभ फल दिखाते हैं—और यदि जो शुभ नहीं है अर्थात् पाप-ग्रह अपनी नीच राशि में, शत्रु-राशि में छठे या बारहवें बैठे हों तो वे क्या फल दिखावेंगे ? वे अपनी दशा में अमोघ दुःख
- मूल में “स्वोच्चस्थित” यह शब्द आया है—स्वराशि या उच्च राशि यह अर्थ लेने से शुक्र यदि वृष, तुला, मीन किसी में हो तो उपर्युक्त फल करेगा। किन्तु यदि स्त्रोच्च का यह अर्थ लिया जावे कि अपनी उच्च राशि में, तो उपर्युक्त योग केवल तभी बनेगा जब शुक्र मीन का हो । हम दूसरे अर्थ के पक्ष में हैं । और ग्रह बारहवें घर में अच्छे नहीं माने जाते, किन्तु भोग प्रदाता शुक्र द्वादश में बहुत भोग कराता है ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०१ दिखाते हैं । अमोघ कहते हैं ऐसे कष्ट को जो निश्चय ही होता है और जिससे छुटकारा पाना सम्भव न हो ॥ २७ ॥ अब तक महादशा, अन्तर्दशा का फल बता रहे थे । अब बीच में अन्तर्दशा का फल बताने वाला एक श्लोक कहते हैं । दशेशशत्रोररिगेहभाजो लग्नेशशत्रोरपि वाऽथ भुक्तौ । शत्रोर्भयं स्थानलयः तदास्य स्निग्धोपि शत्रुत्वमुपैति नूनम् ॥२८॥ यदि ऐसे ग्रह की अन्तर्दशा हो जो ( १ ) जिस ग्रह की महादशा चल रही है उसका शत्रु हो । ( २ ) या शत्रु-राशि में हो ( ३ ) या छठे हो ( ४ ) या लग्नेश का शत्रु हो, तो ऐसी अन्तर्दशा में शत्रु का भय हो, स्थान भय हो । ( नौकरी या मकान छूटे । ) यह अन्तर्दशा बहुत कष्टकारक बीतती है और जातक के मित्र भी शत्रु हो जाते हैं।* ॥ २८ ॥ यद्भावगः पाकपतिर्दशेशात्- तद्भावजातानि फलानि कुर्यात् । विपक्षरिफाष्टमभावगश्चेद्- दुःखं विदध्यादितरत्र सौख्यम् ॥२९॥ *मूल श्लोक में शब्द आया है 'अरिगेहभाजो' जिसको दो अर्थ हो सकते हैं । ( १ ) शत्रु के घर में हो ( २ ) शत्रु का विचार छठे घर से किया जाता है इसलिये लग्न से छठे घर में हो । ऊपर श्लोक का भावार्थ समझाते हुए यह दोनों अर्थ दे दिये गये गये हैं । यह भी विचार कर लेना चाहिये कि अन्तर्दशा नाथ महादशा स्वामी की शत्रु-राशि में तो नहीं है ।
४०२ फलदीपिका यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा चल रही है वह कहाँ है और जिस ग्रह की अन्तर्दशा चल रही है वह कहाँ है । यदि महादशा के स्वामी से गिनने पर अन्तर्दशा का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें हो तो कष्टकारक होता है । यदि अन्तर्दशा नाथ (महादशा- नाथ से) गिनने पर ६, ८, १२, के अलावा अन्य स्थानों में हो तो अच्छा है । इस श्लोक में यह नयी बात बतायी कि महादशा और अन्तर्दशा का विचार करते समय केवल दोनों ग्रहों का ही अलग २ विचार नहीं कर लेना चाहिये बल्कि यह भी देखना चाहिये कि अन्तर्दशा- नाथ— महादशानाथ से ६, ८, १२ तो नहीं है ॥ २९ ॥ महादशानाथ जिस घर में बैठा है उससे गिनने पर अन्तर्दशा- नाथ जिस घर में बैठा है—उसका फल करेगा—अर्थात् यदि अन्तर्दशानाथ —महादशानाथ से नवम में है तो भाग्य वृद्धि करेगा, दशम में बैठा है तो पद वृद्धि, एकादश में बैठा है तो लाभ । सिद्धान्त यह हुआ कि केवल अन्तर्दशानाथ की स्थिति का विचार लग्न से, या चन्द्र लग्न से ही नहीं करना बल्कि महादशानाथ जिस राशि में बैठा है—उससे भी करना चाहिये । स्वोच्चत्रिकोणस्वहितारिनीचे पूर्णं त्रिपादार्द्धपदालपशून्यम् । क्रमाच्छुभं चेदशुभं विलोमात् मूढे ग्रहे नीचसमं फलं स्यात् ॥३०॥ [L2
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०३ ग्रह नीच राशि में हो तो शुभफल शून्य के बराबर होता है । यदि पाप ग्रह नीच राशि में हो तो पापफल पूर्ण अर्थात् सोलह आना अशुभ होता है । यदि अशुभ ग्रह शत्रु राशि में हो तो बारह आना अशुभ फल; यदि पाप-ग्रह मित्र राशि में हो तो आठ आना अशुभ फल । यदि पाप ग्रह स्वराशि में हो तो चार आना अशुभफल । यदि पाप- ग्रह अपनी मूल त्रिकोण राशि में हो तो दो आना अशुभ फल और यदि उच्च राशि में हो तो पाप फल शून्य के बराबर अर्थात् बहुत कम होता है । यदि ग्रह अस्त हो तो नीच राशि स्थित ग्रह के समान फल करता है ॥ ३० ॥ मन्दमान्द्यगुखरेशरण्ध्रपाः- तन्नवांशपतयोऽपि ये ग्रहाः । तेषु दुर्बलदशा मृतिप्रदा कष्टभे चरति सूर्यनन्दने ॥३१॥ यह देखिये कि निम्नलिखित में सबसे दुर्बल कौन है (क) शनि (ख) मान्दि (ग) राहु (घ) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी (ङ) अष्टमेश और (च) अ से (ङ) तक जो बताये गये हैं वे जिन नवांशों में हैं उन नवांशों के स्वामी । उपर्युक्त में जो सबसे दुर्बल होता है उसकी दशा मृत्यु कारक होती है और मृत्यु तब होती है जब शनि भी गोचरवश अनिष्ट हों ॥ ३१॥ मृतीशनाथस्थितभांशकेशयोः खरत्रिभागेश्वरयोर्बलीयसः । दशागमे मृत्यूपयुक्तभांशक- त्रिकोणगे देवगुरौ तनुक्षयः ॥३२॥
यह देखिये कि (क) अष्टमेश जिस राशि में है उसका स्वामी और (ख) अष्टमेश जिस नवांश में है उसका स्वामी इन दोनों में कौन बलवान् है । इसी प्रकार यह देखिये कि (ग) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी और (घ) लग्न जिस द्रेष्काण में है उसका स्वामी इन दोनों में कौन बलवान् है ? उपर्युक्त बलवान् ग्रह की महादशा हो और बृहस्पति गोचरवश निम्नलिखित स्थानों में से कहीं भी आवे तब मृत्यु होती है । (१) अष्टमेश जिस राशि में हो (२) अष्टमेश जिस नवांश में हो (३) ऊपर (१) और (२) में जो स्थान बताये गये हैं उनसे नवम या पंचम ॥ ३२ ॥ चतुष्टयस्था गुरुजन्मलग्नपा भवन्ति मध्ये वयसः सुखप्रदाः । क्रमेण पृष्ठोभयमस्तकोदय- स्थितोऽन्त्यमध्यप्रथमेषु पाकदाः ॥३३॥ (i) यदि (१) बृहस्पति (२) जन्म राशि का स्वामी (३) जन्म-लग्नेश ये तीनो जन्मलग्न से केन्द्र में हों तो जीवन के मध्य- काल में सुख प्रद होते हैं। अब एकदूसरी बात और बताते हैं। यदि कोई ग्रह शीर्षोदय राशि में हो तो वह अपनी महादशा के प्रारम्भिक काल में ही अपना विशेष फल दिखाता है । यदि कोई ग्रह पृष्ठोदय राशि में हो तो वह अपना फल अपनी महादशा के अन्तिम काल में विशेष दिखाता है । यदि कोई ग्रह उभयोदय राशि में है तो वह अपना फल महादशा के मध्य काल में विशेष दिखाता है। कौन सी राशि पृष्ठोदय होती है, कौनसी शीर्षोदय, यह प्रथम अध्याय के आठवें श्लोक में बताया है । यहाँ यह विशेष कथन है कि मिथुन राशि फलदीपिका के मत से
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०५ उभयोदय है । एक अन्य बात इन राशियों के विषय में अन्यत्र कही गयी है वह भी यहाँ बताते हैं । पृष्ठोदय राशि में क्रूर ग्रह हो तो अत्यन्त अशुभ और शुभ ग्रह हो तो कम अशुभ । शीर्षोदय राशि में शुभ-ग्रह हो तो पूर्ण शुभ, क्रूर-ग्रह हो तो कम अशुभ । उभयोदय में मिश्रत फल ॥ ३३ ॥ यद्भावगो गोचरतो विलग्नात्- दशेश्वरः स्वोच्चसुहृद्गृहस्थः । तद्भावपुष्टिं कुरुते तदानीं बलान्वितश्चेज्जननेऽपि तस्य ॥३४॥ यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा जा रही है वह महादशा के समय, लग्न से किस भाव में जा रहा है । इस श्लोक में यह नयी बात बतायी गयी है कि एक ही महादशानाथ--जब उसकी महादशा जा रही हो--तब गोचरवश भिन्न-भिन्न स्थानों में रहता हुआ भिन्न- भिन्न फल करता है । महादशा स्वामी यदि जन्म कुण्डली में भी बलवान् हो तो जब उसकी महादशा के समय गोचरवश अपनी उच्च । स्वराशि, या मित्र राशि में रहता हुआ लग्न से जिस भाव में भ्रमण करता है उस भाव का पुष्टिकारक होता है । मान लीजिये किसी की कुण्डली में राहु बड़ा बलवान् है । और राहु की महादशा है तो जब गोचरवश जन्म लग्न से ११वें आवेगा तब धन लाभ करावेगा, जब जन्म लग्न से दशम में आवेगा तब पदोन्नति कारक होगा । जब नवम में आवेगा तब भाग्योदय करेगा--इस प्रकार महादशानाथ के गोचरवश, फल में तारतम्य कर विचार करना चाहिये ॥ ३४ ॥
४०६ फलदीपिका बलोनितो जन्मनि पाकनाथो मौढ्यं स्वनीचं रिपुमन्दिरं वा। प्राप्तश्च यद्भावमुपैति चारात्- तद्भावनाशं कुरुते तदानीम् ॥३५॥ ऊपर श्लोक में यह बताया गया है कि यदि दशानाथ जन्म-कुण्डली में बलवान् हो और गोचर में भी बलवान् हो तो क्या शुभ फल देता है। अब यह बताते हैं कि यदि दशानाथ जन्म-कुण्डली में भी निर्बल हो और गोचर में भी निर्बल हो तो क्या अशुभ फल करता है जिस ग्रह की महादशा जा रही है वह यदि जन्म-कुण्डली में बलहीन हो और गोचर के समय अपनी नीच राशि या अपनी शत्रु राशि में जा रहा हो या जब वह सूर्य के पास होने से अस्त हो उस समय वह गोचरवश लग्न से जिस भाव में होता है उस भाव सम्बन्धी अशुभफल करता है । मान लीजिये कन्या लग्न है । शनि अष्टम में । नीच राशि में होने से यह निर्बल है । और मान लीजिये शनि की महादशा है तथा शनि गोचरवश सिंह राशि में जा रहा है। सूर्य शनि का शत्रु है । इस कारण जब शनि सिंह राशि में जायगा तब लग्न से बारहवें घर में होने के कारण, १२वें भाव-सम्बन्धी अशुभ फल दिखायेगा ॥ ३५ ॥ मूल श्लोक में कई जगह पाकप्रभु या पाकनाथ यह शब्द आया है इस कारण जो सिद्धांत दशानाथ पर लागू होंगे वह अन्तर्दशानाथ पर भी लागू होंगे ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०७ दशेशस्य तुङ्गे सुहृद्भे दशेशात् त्रिषट्कर्मलाभत्रिकोणास्तभेषु । यदा चारगत्या समायाति चन्द्रः शुभं संविधत्तेऽन्यथा चेदरिष्टम् ॥३६॥ अब यह बताते हैं कि दशानाथ से किन-किन स्थानों पर जब चन्द्रमा गोचरवश आता है तब शुभ फल करता है । (क) दशानाथ की उच्च राशि, (ख) दशानाथ के मित्रों की राशि, (ग) दशानाथ से तृतीय, पाँचवे, छठे सातवे, नवें, दसवें, और ग्यारहवें । चन्द्रमा एक राशि में केवल सवा दो दिन रहता है । मान लीजिये आपको यह विचारना है कि दशानाथ के दृष्टिकोण से आज का चन्द्रमा कुछ शुभफल दिखायेगा क्या ? तो यह देख लीजिये कि क्या चन्द्रमा गोचर, वश उपर्युक्त किन्हीं राशियों में है । यदि गोचर वश चन्द्रमा अन्य राशि में हो तो उस काल में महादशानाथ का शुभ फल प्राप्त नहीं होगा ॥ ३६ ॥ पाकप्रभुर्गोचरतः स्वनीचं मौढ्यं यदायाति विपक्षभं वा । कष्टं विदध्यात्स्वगृहं स्वतुङ्गं वक्रं गतः सौख्यफलं तदानीम् ॥३७॥ जिस ग्रह की दशा या अन्तर्दशा जा रही हो वह गोचरवश यदि अपनी नीच राशि में या शत्रु राशि में जा रहा हो या सूर्य के समीप होने के कारण अस्त हो जावे तो ऐसी स्थिति में वह ग्रह कष्ट देगा । प्रायः यही बात ऊपर के ३५वें श्लोक में भी बतायी गयी है । अन्तर केवल यह है कि ऊपर ३५वें श्लोक में यह कहा है कि यदि "वह दशानाथ जन्म के समय भी बलहीन हो" किन्तु
यह बात ३७वें श्लोक में नहीं कही गयी । इससे परिणाम यह निकला कि जिस ग्रह की महादशा हो वह जब गोचरवश अस्त होता है या अनिष्ट राशि को प्राप्त होता है तो कष्टकारक होता है । अब दूसरी बात लीजिये । जिस ग्रह की दशा या अन्तर्दशा हो वह जब गोचरवश अपनी स्वराशि या अपनी उच्चराशि को प्राप्त होता है या वक्र हो जाता है तो उस समय अच्छा फल देता है । पाकेशस्य शुभप्रदस्य भवनं तुङ्गं प्रपन्ने यदा सूर्ये तत्फलसिद्धिमेति गुरुणाऽप्येवं फलं चिन्तयेत् । नीचं कष्टफलप्रदस्य च दशानाथस्य वैरिस्थलं प्राप्ते भास्वति गोचरेण लभते तस्यैव कष्टं फलम् ॥३६॥ यदि कोई ग्रह शुभफल देने वाला है और उसकी दशा व अन्त- र्दशा चल रही है तो उसका शुभ फल किस समय होगा ? शुभफल तब होगा जब उस दशानाथ या अन्तर्दशानाथ की उच्चराशि में गोचरवश सूर्य जावे । या उस दशानाथ या अन्तर्दशानाथ की उच्चराशि में गोचरवश बृहस्पति जावे । मान लीजिये किसी जन्म-कुण्डली में शुक्र शुभ-प्रद है और उसकी महादशा या अन्तर्दशा चल रही है । शुक्र की उच्च राशि मीन है । ऐसी स्थिति में जब गोचरवश सूर्य मीन में आवेगा या जब वृहस्पति गोचरवश मीन राशि में आवेगा तब शुभ फल होगा । अब दूसरी बात लीजिये । कोई ग्रह जन्म-कुण्डली में कष्ट- प्रद है और उसकी दशा या अन्तर्दशा चल रही है तो विशेष कष्ट फल कब होगा ? जब उस ग्रह की नीच राशि में या उस ग्रह की शत्रु राशि में गोचरवश सूर्य आवे तब विशेष कष्ट होगा ॥ ३८ ॥ येन ग्रहेण सहितो भुजगाधिनाथ- स्तत्खेटजातगुणदोषफलानि कुर्यात् ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०९ सर्पान्वितः स तु खगः शुभदोऽपि कष्टं दुःखं दशान्त्यसमये कुरुते विशेषात् ॥३६॥ राहु जैसे ग्रह के साथ बैठता है उसके गुणदोष ग्रहण करके उसी ग्रह का सा प्रभाव दिखाता है । साथ की कुण्डली में राहु शुक्र के [कुण्डली: लग्न ४; २ भाव ५; ३ भाव ६; ४ भाव ७ में रा. शु.; ५ भाव ८; ६ भाव ९;] साथ है । इस लिये शुक्र के जो भी गुण [७ भाव १०; ८ भाव ११; ९ भाव १२; १० भाव १; ११ भाव २; १२ भाव ३] या दोष हैं वह राहु भी करेगा । यह श्लोक के प्रथम दो चरणों में कहा गया है । आगे चलकर कहते हैं कि जो ग्रह राहु के साथ बैठता है वह ग्रह चाहे शुभ हो किन्तु कष्टकारक होता है खास . कर—अपनी दशा के अन्त के समय में । उदाहरण कुण्डली में शुक्र राहु के साथ है इसलिये शुभ होने पर भी शुक्र कष्टकारक होगा । कहने का तात्पर्य यह है कि राहु सर्प है यह अपना विष अपने साथ में रहने वाले ग्रह को दे देता है ॥ ३९ ॥ द्वावर्थकामाविह मारकाख्यौ तदीश्वरस्तत्र गतो बलाढ्यः । हन्ति स्वपाके निधनेश्वरो वा व्ययेश्वरो वाऽप्यतिदुर्बलश्चेत् ॥४०॥ द्वितीय और सप्तम भाव को मारक स्थान कहते हैं । यदि इनके स्वामी या अन्य ग्रह बलवान् होकर इन स्थानों में पड़े हुए हों तो वह अपनी दशा में मृत्यु करते हैं । यदि अष्टमेश या व्ययेश भी अति दुर्बल हों तो उसकी भी दशा में मृत्यु हो सकती है ॥ ४० ॥