फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह देखिये कि (क) अष्टमेश जिस राशि में है उसका स्वामी और (ख) अष्टमेश जिस नवांश में है उसका स्वामी इन दोनों में कौन बलवान् है । इसी प्रकार यह देखिये कि (ग) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी और (घ) लग्न जिस द्रेष्काण में है उसका स्वामी इन दोनों में कौन बलवान् है ? उपर्युक्त बलवान् ग्रह की महादशा हो और बृहस्पति गोचरवश निम्नलिखित स्थानों में से कहीं भी आवे तब मृत्यु होती है । (१) अष्टमेश जिस राशि में हो (२) अष्टमेश जिस नवांश में हो (३) ऊपर (१) और (२) में जो स्थान बताये गये हैं उनसे नवम या पंचम ॥ ३२ ॥ चतुष्टयस्था गुरुजन्मलग्नपा भवन्ति मध्ये वयसः सुखप्रदाः । क्रमेण पृष्ठोभयमस्तकोदय- स्थितोऽन्त्यमध्यप्रथमेषु पाकदाः ॥३३॥ (i) यदि (१) बृहस्पति (२) जन्म राशि का स्वामी (३) जन्म-लग्नेश ये तीनो जन्मलग्न से केन्द्र में हों तो जीवन के मध्य- काल में सुख प्रद होते हैं। अब एकदूसरी बात और बताते हैं। यदि कोई ग्रह शीर्षोदय राशि में हो तो वह अपनी महादशा के प्रारम्भिक काल में ही अपना विशेष फल दिखाता है । यदि कोई ग्रह पृष्ठोदय राशि में हो तो वह अपना फल अपनी महादशा के अन्तिम काल में विशेष दिखाता है । यदि कोई ग्रह उभयोदय राशि में है तो वह अपना फल महादशा के मध्य काल में विशेष दिखाता है। कौन सी राशि पृष्ठोदय होती है, कौनसी शीर्षोदय, यह प्रथम अध्याय के आठवें श्लोक में बताया है । यहाँ यह विशेष कथन है कि मिथुन राशि फलदीपिका के मत से